मुहब्बत मै ये क्या मकाम आ रहेँ हैं ,
के मंजिल पे हैं और चले जा रहेँ हैं !
ये कह - कह के हम दिल को समझा रहेँ हैं ,
वो अब चलें हैं ........ वो अब आ रहेँ हैं !
फकत मुकद्दर पर जिन्दा रहना ,
निकम्मापन और बुझदिली है !
अमन की दुनियां मै मेहनत करके ,
अपना हिस्सा वसूल करलो तुम !
उजड़ जायेगा चमन ये बाक़ी ,
गर और कांटें न हटाओगे तुम !
गुलिस्तान की गरचे खेर चाहो ,
तो चंद कांटें कबूल करलो तुम !