सोमवार, 23 मई 2011

थियोडोर रोजैक

1933 में केलिफोर्निया में जन्मे और वहीँ पले - बड़े थियोडोर रोजैक पहले स्टेनफोर्ड फिर उसके बाद स्टेट यूनिवर्सिटी आफ कलिफोर्निया में प्रोफ़ेसर के रूप में ' वन डाईमेंशनल मैन ' से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पहली कृति ' मेकिंग ऑफ़ ए काउंटर कल्चर ' का प्रकाशन किया जो अपने आपको ' फ्लावर चिल्ड्रेन ' कहते थे , जबकि सार्वजनिक में उन्हें हिप्पी कहा जाता था | यांत्रिक जीवन की एकरसता  से ऊबे और वियतनाम की लड़ाई से नाराज इन सभी ने जो जीवन - पद्दति अपनाई , वह सामाजिक सरोकार से मुक्त एक परम स्वच्छंद आवारा जीवन शैली थी , जिसमे मादक दवाइयां , चरस , मांस और गांजे के धुएं में अपनी जवानी  बर्बाद करना एक तरह का फैशन बन गया था | 1972 में उनकी दूसरी कृति आई ' हेव्यर द वेस्टलैंड एंड्स ' | इस कृति को लेकर अमेरिका के कई विश्व विद्यालयों  में काफी समय तक कई विचार गोष्ठियां हुई और माना यह गया की थियोडोर रौजेक भविष्य पारखी बौद्धिक   हैं |
            रौजेक की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति है __  ' मैन द अनफिनिश्ड  एनिमल | ' थियोडोर रौजेक का मानना है की बीसवीं सदी के अंत के साथ मनुष्यता अब कुम्भ युग में प्रवेश  कर रही है | इसका आभास इन तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों और अध्यात्मिक आंदोलनों में झलकता है | जो पिछले अनेक वर्षों से चलाये जा रहे हैं | संवेदना - बोध , अंगिकी , ध्व्न्यावर्तन , आइचिंग , कबीलावाद , उर्जा बिंदु , सुचिकावेध   जैसी अधुनाविधियाँ तो हैं ही , इन्हीं के साथ तमाम उपदेशकों की देश्नाएं भी शामिल है जो आदमी की समझ का दायरा बढ़ाना चाह रही है | सब तरह की आतंकी विक्रिया के बावजूद ये  शामक विधियाँ आगे बढती  जाएँगी |
         मनस्विदों का कहना है की अधिकांश मनोरोग संपन्न वर्ग को ही पीड़ित करते हैं | इस पीड़ा का आधार नैतिक और राजनैतिक ग्लानि है | पूर्णत : स्वस्थ आदमी राजनिति में रूचि ही नहीं लेता , क्युकी किसी न किसी तरह की शक्ति , आस्तित्व की शर्त बन गई है , इसलिए हीनभावनाग्रस्त सत्तार्थी हो जाते हैं | वैभव और उत्सवधर्मी समाज गहराई कम प्रचारसिक्त उथलापन अधिक जीता है , मगर भीतर ही भीतर अपने खोखलेपन से भी त्रस्त रहता है | अमेरिका में व्यक्ति को मिलने वाली सुरक्षा का परिणाम यह हुआ है की वयस्क बचकाने हो गये हैं भीतर की ग्लानि से छुटकारा पाने के लिए वे किसी भी तरह की साधना - पद्दति का अनुगमन करना कहते हैं ताकि विरेचन हो पाए | संगणक और उत्सव तमाशों के बीच झूलती आजकी दुनिया में काफी लोग ऐसे हैं , जो ' शिखर अनुभव ' से गुजारने के लिए अधीर हैं |
         रौजेक कहते हैं की काफी अरसे तक यह  भ्रान्ति पनपती रही की मनमाने अतिचार से तनाव कम होते हैं | शांत रहना आ जाता है मगर इस अतिचार का नतीजा यह हुआ की हमने ईश्वर  को कम्पूटर और खेल - तमाशों के बीच फंसा दिया | नतीजा यह की आज हमारे पास तरह - तरह के आंकडें तो है , परन्तु ईश्वर  खो गया |
           थियोडोर कहते हैं ____ ' हम किसी महापशु की छाया में रंगरलियाँ  मनाया करते हैं | अकरणीय के पक्ष में तर्क  देते हैं फिर पोपुलर मैकेनिक्स का हिस्सा  हो लेते हैं ' | इसके ठीक विपरीत ऐसे लोगों की संख्या भी तेजी से बढ रही है जो विचार करते हैं की कुछ है जो नहीं मिला उसे पाना है | कुम्भ युग में ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ रही है की जिंदगी के आत्यंतिक प्रश्नों का उत्तर इसी वय में मिल जाना अनिवार्य है | रौजेक हक्सले के स्वर में स्वर मिलाकर कहते हैं की छलांग अब लगने ही वाली है | जो महाकाव्य पृथ्वी से लेकर बाहरी  दिक् तक लिखा पड़ा है उसकी प्रस्तावना लिखी जा रही है | बीसवी सदी के मध्य में स्टाईनर  ने एक प्रयोग किया था | उसने स्मृति - कोश को निस्पंद कर एक रिक्ति  पैदा की थी और पाया था कि सिरकाडियन रिदम ने उस रिक्ति को भरना शुरू कर दिया था |  स्टाईनर ने अनुभव किया था कि इस प्रयोग के क्षणों में मस्तिषक कि कोशिकाओं में दिव्यता का अंश बढ़ने लगा था | फ्रांस के संत गुर्जिएफ ने भी अनर्गल साधना - पद्दति दव्वारा यह सिद्ध किया था की हम सबके भीतर रोबोट बैठा है , जो कोई नया कार्य प्रारंभ कर चुकने के बाद तत्काल हमें जकड लेता है और हमें नए अनुभव के दरवाजे तक जाने से रोक देता है | आज पश्चिम में लोकप्रिय  टी गुप्त , भिड्न्तु गोष्ठियां , सिनानो क्रीड़ायें , एस्त आदि सभी किसी न किसी रूप में गर्जिएफ़ से अनुप्रेरित होकर प्रचलन  में आई |
            आस्था का युग पार्क का युग , उद्विग्नता का युग और अन्तत : अब रोगोपचार का युग प्रचलन में आ चूका है | यह सब इसलिए की मुरझाई आत्माएं दो बार प्रमुदित हो सकें | हमारे देश की वैदिक , बौद्ध और तांत्रिक परम्पराओं का हवाला देते हुए रौजेक अंततः पतंजलि के योग - दर्शन पर आता है कि सही और ठीक तरह पर अगर सम ही सध जाए तो समाज अपने आप नैतिक होना शुरू कर देगा | जो व्यक्ति मैथुन , चोरी और झूठ का त्याग नहीं कर सकता , वह नियम , आसन और प्राणायाम क्या करेगा ? तो भी रौजेक का कहना यही है कि रास्ता यही है |    

शनिवार, 7 मई 2011

रवीन्द्रनाथ टेगौर

रवीन्द्रनाथ टेगौर  ( 1867 - 1941 ) का जन्म कलकत्ता में एक समृद्ध और सुसंस्कृत परिवार में हुआ था | उनके पिता देवेन्द्रनाथ टेगौर ब्रह्म समाज के बड़े नेताओं में से एक थे | रवीन्द्रनाथ को बचपन से ही धर्म , साहित्य , संगीत और चित्रकारी का वातावरण मिला | 1878 में वे कानून  के अध्ययन के लिए कुछ समय तक इंग्लैण्ड  में रहे , मगर शीघ्र ही भारत  वापस लौट आए और उन्होंने लेखन को ही अपना व्यवसाय बना लिया | वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और एक साथ कवि , कहानीकार , नाटककार , गीतकार , दार्शनिक  शिक्षक और चित्रकार थे | उन्होंने बंगला में लिखा , लेकिन उनकी कृतियों का भारतीय  और विदेशी भाषाओँ में वृहद् स्तर पर अनुवाद हुआ |
       1901 में उन्होंने बोलपुर में अपने विद्यालय शांति निकेतन की स्थापना की | इस विद्यालय की आशतीत सफलता विश्वभारती की स्थापना का कारण बनी | यह संख्या पश्चिमी  और भारतीय शिक्षा तथा दर्शन को समर्पित थी | 1921 में इसे विश्व विद्यालय की मान्यता मिली | टैगोर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे | उन्हें महान राष्ट्र प्रेमी कहा गया | टैगोर राष्ट्र की अवधारणा के दुष्परिणामों के प्रति आशंकित भी थे | इसके बारे में उन्होंने व्यापक तौर पर भी लिखा | उन्हें सर्वाधिक ख्याति कविता - संग्रह ' गीतांजलि ' के कारण मिली जिसने पश्चिम को अभिभूत कर दिया था | गीतांजलि  के लिए उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था | 1915 में उन्हें ' सर ' की उपाधि से विभूषित किया गया था | लेकिन 1919 में जलियांवाला नरसंहार के बाद उस उपाधि को उन्होंने लौटा दिया | 
      टैगौर की एक हजार से भी ज्यादा कवितायेँ , कहानियों के आठ संग्रह , लगभग दो दर्जन नाटक और नाटिकाएं आठ उपन्यास और दर्शन , धर्म , शिक्षा तथा समाजिक विषयों पर अनेक पुस्तकें और निबंध प्रकाशित हुए | शब्द और नाटक की दुनियां के आलावा संगीत से भी उन्हें गहरा लगाव था | उन्होंने 2000 से अधिक गीतों की रचना की और उन्हें संगीतबद्ध किया |इनमें से दो भारत और बंगलादेश के राष्ट्र गान बनें | उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं ::: ' सोनातरी ' ( 1894 ) , ' चोखेर बाली ' ( 1903 ) , ' नौका डूबी  ' ( 1905 ) ' गोरा ' (1907 ) और ' घरे - बहिरे ' ( 1916 ) |
काबुलीवाला ____ यह टैगौर की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है | सर्वभोम मानवीय संवेदना को उकेरने वाली यह कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है | कहानी का केन्द्रीय पात्र काबुली वाला अपनी बेटी की छवि लेखक की पुत्री मिनी में देखता है | वह मिनी पर अपना सारा प्यार उडेलता रहता है , यधपि मिनी की माँ की नज़रों में वह संदिग्ध है | कहानी में बालमन का बड़ा हृदयग्राही और यथार्थ चित्रण हुआ है |
' शाहजहाँ ' _____यह कविता ताजमहल के सर्वाधिक गीतात्मक वर्णन के लिए जानी जाती है , लेकिन यह मात्र गीतात्मक वर्णन ही नहीं है | जहां यह एक और प्रेम और सोंदर्य के उत्सव का सृजन करती है , दूसरी और यह इस बात की गहरी अनुभूति करवाती है की विनाश या उच्छेद के विरुद्ध मनुष्य का संघर्ष चाहे वह स्थापत्य के माध्यम से हो या साहित्य के माध्यम से अन्तत : पराजय की और होता है | अगर कोई वस्तु शेष रह जाती है तो वह है आंतरिक भावनात्मक प्रत्युतर , जो काल और स्थान के परे अनुभूत होता रहता है |

रविवार, 1 मई 2011

दुस्साहसी लेखिका लिलियन हेलमैन

  लिलियन हेलमैन का जन्म 20 जून 1905 को अमेरिका में मध्यवर्गीय यहूदी परिवार में हुआ था | उसके पिता मैक्स मार्क्स अमेरिका गृहयुद्ध के दिनों में जर्मनी छोड़कर अमेरिका आ गये थे | मैक्स की बहनें एक मोटेल चलाती थी | लिलियन का जन्म भी यहीं हुआ |लिलियन अपने अभिभावकों की अकेली संतान थी | लिलियन शुरू से काफी बातूनी थी | उनकी माँ हलांकि एक संभ्रांत परिवार की थी , मगर लिलियन के लिए उनके पिता ही उनके हीरो थे | मोटेल में आकर ठहरने वाले यात्रियों के बारे में मनघडंत किस्सों का ब्यौरा देना लिलियन की आदत बन चुकी थी | हेलमैन के प्रारंभिक जीवन की कहानी विलिम राइट ने लिखी है | 19 वर्ष की आयु में उन्हें पहली नौकरी बोनी एंड लिवराइट नामक न्यूयार्क के प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थान में मिली | लिलियन का कहना है कि विलियम फाकनर कि प्रतिभा को सबसे पहले उन्होंने ही पहचाना और इस तरह फाकनर के प्रसिद्ध व्यंग उपन्यास ' मस्किटोज़ ' का प्रकाशन संभव हुआ | इसी दौर में वह गर्भवती हुई और गर्भपात के बाद उन्होंने नाट्य अभिनेता आर्थर कोबर से विवाह कर प्रकाशन संस्थान से त्यागपत्र दे दिया | अब वो घर बैठकर समीक्षाएं लिखने लगी | इसी अवधि में उन्हें ' लाइफ ' पत्रिका के संपादक डेविड कोड से प्रेम हो गया | इसके बाद वे अपने पति कोबर के साथ 1939 में पेरिस और वान कि यात्रा करने निकली | यात्रा से लौटकर लिलियन ने हालीवुड कि फिल्मों के लिए पटकथा लिखने का सिलसिला शुरू किया | मेट्रो गोल्डविन मेयर नामक हालीवुड के चित्रपट संस्थान ने उन्हें 50 डालर साप्ताहिक पगार देना मंजूर किया | यहाँ उन्होंने कैमरे  के पीछे काम करने वालों के  दल के साथ हड़तालें भी करवाई | यहीं उनकी मुलाकात रहस्य कथा लेखक डेशियल हैमेट से हुई | हैमेट भयंकर शराबी था | उसकी लिखी रहस्य कथाओं से उसे अकूत धन प्राप्त हो चूका था | परिणामतः वह काफी प्रमादी हो चूका था | उसकी प्रसिद्ध  कृति ' द टिन मैन ' का प्रकाशन 1934 में हुआ | हेलमैन ने हैमेट कि कहानी बड़े रोचक ढंग से लिखी है | लिलियन ने स्वीकार है कि उसके सम्बन्ध हैमेट से भी थे इसे भी एक विचित्र संयोग ही माना जाना चाहिए कि लिलियन से मिलने के बाद हैमेट का लेखन लगभग बंद हो गया और लिलियन कि लोकप्रियता बढने लगी | ऐसा लगने लगा कि जैसे  हैमेट कि प्रतिभा ने परकाया परवेश कर लिलियन को सफलता के उच्च शिखर पर पहुचाने कि ठान ली हो | उसकी कृति ' द चिल्ड्रेन्स आवर' कि सफलता से झल्लाकर एक समीक्षक ने तो यहाँ तक कह दिया कि उसकी पटकथा कहीं और से ली गई है | ' द चिल्ड्रन आवर ' के आसपास उठ खड़े हुए विवाद का परिणाम यह हुआ कि लार्ड चेंबरलेन ने लन्दन में इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी | यही नहीं स्वयं  अमेरिका के शिकागो और बोस्टन आदि शहरों में भी इसका प्रदर्शन नहीं हो सका | न्यूयार्क  में अवश्य इसने बॉक्स आफिस कि ऊँचाइयों को छुआ | सभी प्रगतिशील बौद्धिकों ने इसकी सराहना की | हलांकि 1934 - 1935 का पुलित्ज़र परुस्कार इसे तभी भी नहीं मिला | लिलियन की अगली नाटय कृति  ' डेज़ टू कम ' जिसकी थीम हड़तालों पर आधारित थी , उतनी सफल नहीं हुई | लिलियन की अपनी कृति ' द लिटिल फोक्सेज़ ' ( 1939 ) का घटनाचक्र धन , मुनाफाखोरी और लोभ की कहानी कहता है | इस कृति को लिखने की प्रेरणा लिलियन को उन पात्रों से मिली जो बचपन में उसके मोटेल अथवा बोर्डिंग हॉउस में आकर ठहरते थे , जिसे उसके पिता की बहनें चलाया करती थी | ये सभी पात्र न्यूयार्क आते ही इसलिए थे की किस तरह अधिक से अधिक धन कमाया जाए | ' द लिटिल फोक्सेज ' की लगभग सभी समीक्षकों ने सराहना की है | इसकी सफलता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है की इसका मंचन लगातार 410 दिन  तक होता रहा और उसे लिलियन की सर्वाधिक सफल कृति माना गया | दो वर्ष बाद लिलियन हेलमैन  की अगली नाट्यकृति ' वाच ऑन द राइन ' आई | इसका नायक एक वामपंथी युवा है , जो नात्सियों से संघर्ष करता है और अंत में खलनायक को मार डालने में सफल होता है | एक वर्ष बाद सैम गोडविन जिसके कहने पर लिलियन ने ' द चिल्ड्रेन्स  आवर ' , ' डेज तो कम ' और ' वाच ऑन द राइन ' लिखे थे | लिलियन के पास ये प्रस्ताव लेकर आया कि लिलियन इन तीनों नाट्यकृतियों में से समलैंगिकता वाला अंश घटाकर इन्हें फिर लिखा जाए , जबकि ये तीनों कृतियाँ अब तक क्लासिक कि श्रेणियों में रखी जाने लगी थी | लिलियन शायद इसके लिए राज़ी नहीं हुई | लिलियन कि विचारधारा वामपंथी थी | उसकी कृतियों और पटकथाओं में लगातार एसी पंक्तियाँ  आती हैं , जो सर्वहारा वर्ग की पीड़ा को वाणी देती है | शिथिल चरित्र की होने की बावजूद उसके संवादों में उर्जा है | लिलियन के विषय में एसा कहा जाता है कि वह बंधनहीन विचारों कि महिला थी | वे खुद लोगों को अपने आवास पर भोजन के लिए आमंत्रित करती थी | एक सूत्र वाक्य कहता है ___ ' कविता वनिता च सुखदा स्वयंमागता ' अर्थात स्त्री और कविता जब अपने आप आए तभी सुखकर होती है | यह गुण लिलियन में भी कूट - कूट का भरा था |

रविवार, 17 अप्रैल 2011

कामयाबी यों ही नहीं मिलती... बिल गेट्स

क्या आपमें है कुछ कर गुजरने की तमन्ना ? क्या आपके पास कोई मकसद , कोई विजन , कोई आइडिया ? यदि एसा कोई लक्ष्य नहीं है , तो घर बैठिए | और अगर आपका जवाब हाँ है तो , अपनी योग्यता को आंकिए और अपने काम में जुट जाइए |
              बिल गेट्स दुनियां के सबसे अमीर लोगों में से हैं | वह महादानी भी हैं | 28 अक्तूबर 1955 को इनका जन्म हुआ था , लेकिन 32  साल पुरे होने के पहले ही 1987 में उनका नाम अरबपतियों की फ़ोर्ब्स की सूचि में आ गया और कई साल तक वो इस लिस्ट में नम्बर वन पर भी रहे | 2007 में उन्होंने 40 अरब डालर ( लगभग 176 अरब रूपये ) दान में दिए | बिल गेट्स माइक्रोसाफ्ट के चेयरमैन हैं , जिसका साल 2010 का  करोबार 63 अरब डालर और मुनाफा करीब 19 अरब डालर था | आंखिर क्या है बिल गेट्स की कामयाबी  का मन्त्र ?
उच्च जीवन उच्च विचार :::::::::
            बिल गेट्स खाते - पीते घर के हैं | स्कूल में उन्होंने 1600 में से 1590 नंबर पाए थे पढाई के दौरान ही कंप्यूटर  प्रोग्राम बनाकर उन्होंने 4 , 200 डालर कमा  लिए थे और टीचर से कहा था कि मैं 30 वर्ष कि उम्र में करोडपति बनकर दिखाऊंगा और 31 वर्ष में वह अरबपति बन गये | वह विलासितापुर्वक नहीं रहते , लेकिन वह व्यवस्थित जीवन जीते हैं | डेढ़ एकड़ के उनके बंगले  में सात बेडरूम , जिम स्विमिंग पूल थियेटर आदि हैं | पन्द्रह साल पहले उसे करीब 60 लाख डालर में खरीदा था | उन्होंने लियोनार्दो दी विंची के पत्रों , लेखों को तीन करोड़ डालर में खरीदा था | ब्रिज , टेनिस और गोल्फ के खिलाडी बिल गेट्स अपने तीन बच्चों के लिए अपनी पूरी जायदाद छोड़कर नहीं जाना चाहते , क्युकी उनका मानना है कि अगर मैं अपनी संपत्ति  का एक प्रतिशत भी उनके लिए छोड़ दूँ तो वह काफी होगा | उन्होंने दो किताबें भी लिखीं हैं , द रोड अहेड और बिजनेस @ स्पीड ऑफ़ थोट्स |
           साल 1994 में उन्होंने अपने कई शेयर्स बेच दिए और एक ट्रस्ट बना लिया , जबकि उन्होंने 2000 में  अपने तीन ट्रस्टों को मिलाकर एक कर दिया और पूरी पारदर्शिता से दुनियां भर में जरूरतमंद लोगों की मदद करने लगे | बिल गेट्स की कमी , एकाधिकारी व्यवसायिक निति और प्रतिस्पर्द्धा उन्हें बार - बार विवादों में भी धकेलती रही है | 16 साल तक अरबपतियों की सूचि में नंबर वन रह चुके बिल गेट्स अपनी कामयाबी के सूत्र इस तरह बताते हैं |
दुनिया बदलो या घर बेठो ::::::
           क्या आपमें है कुछ कर गुजरने की तमन्ना ? क्या आपके पास है कोई मकसद , कोई विजन , कोई आइडिया , कोई इनोवेशन ? यदि कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है , तो अपने घर बैठिये और अगर आपका जवाब हाँ में है तो अपनी योग्यता को आंकिये और अपने काम में जुट जाइये |
रस्ते खुद बनाओ ::::::::
            आज जो भी रास्तें हैं , वे हमेशा से नहीं थे | किसी न किसी ने तो उन्हें बनाया ही है | नये रस्ते बनाने की कोशिश पर हो सकता की लोग आपको सनकी कहें , पर आप डिगे नहीं | जब मैनें हर डेस्क पर और हर घर में कम्प्यूटर  की कल्पना की , तब किसी को इस बात की कल्पना नहीं थी | मुझे भरोसा था की कम्प्यूटर  हम सबकी जिंदगी को बदलकर रख देगा |
उसूलों पर डेट रहो :::::::
            कभी भी अपने सिद्धांत से न हटें | याद रखिये सभी लोग केवल धन के लिए काम नहीं करते | मेरे साथ जितने भी लोगों ने काम शुरू किया था वे सभी जानते थे कि वे धन कमानें के लिए नहीं बल्कि लोगों कि जिंदगी बेहतर बनाने के लिए काम कर रहें हैं | हम टेक्नलोजी कि मदद से लोगों के जीवन को आसान बनाना चाहते थे , और वह हमने कर दिखया | यह धन कमानें से ज्यादा बड़ा काम है |
हमेशा आगे कि सोचो ::::::::
             दुनियां तेज़ी से बदल रही है | अगर आप आगे कि नहीं सोच सकते , तो पिछड़ जायेंगें | आपको संभलने का वक़्त भी नहीं मिल पायेगा | आपको खेल में आगे आने के लिए और यहाँ तक कि खेल में बनें रहने के लिए आगे कि बातें सोचनी होंगी | इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ ही बाज़ार कि जरूरतें क्या - क्या रहेंगीं , यह जानना आवश्यक है |
सही लोगों को साथ लें ::::::::
             कोई भी प्रतिभा किसी कार्य को सही अंजाम तभी दे सकती है , जब उसे सही लोगों का साथ मिले | अगर आपमें बहुत प्रतिभा है , लेकिन सहकर्मी और नियोक्ता आपका साथ न दें तो नतीजा क्या होगा ? ऊँचें लक्ष्य को लेकर सर्वश्रेष्ठ योग्यता से काम करने वाले लोग ही कामयाबी पा सकते हैं | अगर मेरे साथ पल एलेन और स्टीव बालमेर जैसे प्रतिभाशाली और विलक्षण मित्र तथा सहकर्मी नहीं होते , जो मेरी कमियों को दूर कर देते थे तो आज मैं इस जगह नहीं पहुंच पाता |
सिस्टम बनाएं ::::::::
            कोई भी काम करने के लिए एक सिस्टम जरूरी है जिससे कि सारे काम आसानी से हो सकें | यह सिस्टम माइक्रो या मेक्रो हो सकता है जरूरी नहीं कि हम  ही सिस्टम बनाएं , आप कोई भी अच्छा सिस्टम बना सकतें हैं , पर यह ध्यान रखिये कि कहीं ये सिस्टम अनुत्पादकता  को तो नहीं बढ़ा  रहा ?
समस्याओं को टुकड़ों में हल करो :::::
           किसी भी समस्या को दूर करने के लिए बारीकी से समझना जरूरी है | हो सकता है कि वह समस्या एक झटके में न दूर हो सके , ऐसे में उसे टुकड़ों में बात कर हल किया जा सकता है | इस तरीके से बड़ी से बड़ी और तात्कालिक समस्याओं से भी पार पाया जा सकता  है |
नाकामी को भी मत भूलो :::::::
            अपनी हर कामयाबी  का जश्न जरुर मनाओ , जिससे आपको अपनी कामयाबी पर नाज़ हो और आप हर कामयाबी को पाना चाहें , लेकिन कभी भी अपनी नाकामी को भी मत भूलो | अपनी नाकामियों से सबक सीखो और उसे दोहरानें से हमेशा बचो |

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

संघर्ष और साधना का नाम भैरप्पा

     वर्ष 2010 के लिए सरस्वती सम्मान से विभूषित कन्नड़ साहित्यकार   भैरप्पा ने जिंदगी के कई रूप देखे | उनके लेखन में इन कठिन अनुभवों के साथ उनके गहन अध्ययन का आधार दिखाई देता है |
कन्नड़ के प्रसिद्ध साहित्यकार संथेशिवारा लिंग्नय्या  भैरप्पा को उनके चर्चित उपन्यास ' मंद्र ' के लिए वर्ष 2010 का सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया था | भैरप्पा का नाम आधुनिक कन्नड़ - साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों में शुमार है | वास्तविकता यह है की आज वे कन्नड़ भाषा व् साहित्य की परिधि को लाँघ कर न सिर्फ अखिल भारतीय स्तर पर मान्य  हो चुकें हैं बल्कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पर्याप्त चर्चा हुई है | उनकी कृतियाँ लगभग सभी प्रमुख भाषाओँ के आलावा अंग्रेजी समेत कई विदेशी भाषाओँ में अनुदित हो चुकी है | हिंदी में तो उनके लगभग सभी  उपन्यासों का अनुवाद उपलब्ध है | शिवराम कारंत के बाद यू . आर . अनंतमूर्ति के आलावा भैरप्पा संभवत : अकेले एसे उपन्यासकार है जिन्हें हिंदी पाठकों के बीच काफी लोकप्रियता मिली है |
      भैरप्पा के अभी तक 22 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं उनकी आलोचना - चिंतन की दो पुस्तकें  छप चुकीं हैं | इसके आलावा उनकी आत्मकथा  ' भित्ति ' भी प्रकाशित हो चुकी है इनसे अलग भी उन्होनें काफी कुछ लिखा है | लेकिन ये एक निर्विवाद तथ्य है की उन्हें व्यापक स्वीकृति एक उपन्यासकार के रूप में ही मिली है | उनका पहला उपन्यास है ' भीमकाय ' जो 1959 में छपा था , जबकि उनका नवीनतम उपन्यास ' आवरण ' 2010 में सबके सामने आया | इनके जिन उपन्यासों की  विशेष  चर्चा होती है , उनमें धर्मश्री, गृहभंग , वंशवृक्ष , दाटू ( उन्लंघन ) , पर्व तब्ब्ली ( गोधुली ) , तंतु साक्षी , सार्थ अदि शामिल हैं |
       भैरप्पा के उपन्यास जिन प्रश्नों से टकराते नज़र आते हैं उनमें धर्म , लोकाचार , सनातनता , जाति, जीवन  की सार्थकता जैसे मुद्दे प्रमुख हैं | ' गृहभंग ' में कथा के स्तर पर प्रत्यक्ष रूप से कोई पुर्वनियोजन किये बिना उन्होनें समाज और परिवार का चित्रण किया है | ' वंशवृक्ष ' में उन्होनें सनातन धर्म के मूल्यों की सार्थकता पर विचार किया है | इससे पूर्व ' गोधूलि ' में उन्होनें पूर्व और पश्चिम की सांस्कृतिक मूल्यों की टकराहट पर कलम चलाई थी | ' दाटू ' में उन्होनें जाति व्यवस्था की उलझनों पर रोशनी  डाली है |
         ' पर्व ' में उन्होंने महाभारत में कथासूत्र को लेकर आधुनिक सन्दर्भों  में उसकी विवेचना की है | उनके साहित्य में जिस चीज़ पर सबसे पहले ध्यान जाता है वह है परम्परा और शास्त्रों के प्रति उनका प्रश्नाकुल लगाव और आधुनिकता के प्रति उनकी आलोचनात्मक दृष्टि | परम्परा और आधुनिकता के बीच के संघर्ष का चित्रण उनके साहित्य को समझने का मुख्य सूत्र हो सकता है | उनके प्राय सभी उपन्यासों में इस विशेषता का समावेश देखा जा सकता है | वे आधुनिक होने के लिए परम्परा को खरिज करने के विचार से परहेज करते हैं | वास्तव में वे परम्परागत मूल्यों का वर्तमान के संदर्भ में प्रत्याख्यान करते हैं | यही उनकी रचनाशीलता का उलेखनीय पक्ष है जो उन्हें महत्वपूर्ण साबित करने के साथ - साथ विवादास्पद भी बनाता है |
     उनका समूचा साहित्य व्यक्तिगत अनुभवों और व्यापक अध्ययन की बुनियाद पर खड़ा है | उनका जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ | 1934 में पुराने मैसूर राज्य के एक मामूली गाँव में जन्में भैरप्पा महज 11 साल की उम्र में अनाथ  हो गये थे | इस कारण  शुरू से ही उन्हें दो जून के भोजन के इंतजाम के लिए भटकना पड़ा | छोटे - मोटे काम करते हुए उनहोंने किसी तरह पढाई जारी रखी | मक्सिम गोर्की और वैकम मोहम्मद बशीर की तरह उन्होंने भी खुद को बचाए रखने के लिए बेहिसाब पापड़ बेले | उन्होंने बांबे सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम किया , तांगा चलाया ,रेस्टोरेंट में वेटर का काम किया , सिनेमाघर में गेटकीपर का काम किया ,मेले में शर्बत की दुकान खोली और घूम - घूम कर अगरबतियाँ  बेचीं  | इस तरह उनके जीवन का खाता संघर्षों के अनगिनत प्रसंगों से भरा हुआ है | मगर इसका दूसरा पक्ष भी है संघर्षों  के बीच भी उन्होंने जमकर अध्ययन भी किया नतीजतन उन्हें मैसूर में अध्यापकी का काम मिला | बाद में वे एन . सी . ई . आर टी , दिल्ली में शिक्षा अधिकारी भी बने | उन्होंने दर्शनशास्त्र के साथ - साथ कला , संगीत और सोंदर्यशास्त्र का विशद अध्ययन किया है , जिसका प्रभाव उनकी कृतियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है |
         उनके एक शुरुवाती उपन्यास ' धर्मश्री ' ( 1960 ) की कथाभूमि में संगीत का परिवेश वर्णित है , तो 2002 में प्रकाशित ' मंद्र ' में भी संगीत की मौजूदगी है | सरस्वती सम्मान से सम्मानित ' मंद्र ' में भैरप्पा ने एक बार फिर मूल्य और नैतिकता के प्रश्नों को उठाया है | अपनी छात्रा के प्रति एक शिक्षक का आकर्षण और छात्रा का अपने पति के प्रति नैतिकता के द्वन्द को लेकर रचे गये इस उपन्यास में कला बनाम नैतिकता का पुरातन प्रश्न मुखर हो उठा है |
        साहित्य के संदर्भ में एक चीज़ की अक्सर चर्चा होती है वह है ' पोलिटिकली करेक्ट ' होने का प्रश्न | भैरप्पा के सन्दर्भ में यह अत्यंत महत्वपूर्ण  है | भैरप्पा ने गलत कहे जाने का जोखिम उठाकर भी अपनी बात कही है | उनका मानना है की साहित्य - सृजन सामूहिक काम नहीं होता | यह एक आन्दोलन भी नहीं है | प्रत्येक को अपनी भावना को और दृष्टिकोण के अनुसार अपने आप लिखने का काम करना चाहिए  | इसलिए इसमें नेतृत्व करने का प्रश्न  ही नहीं आता | साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि एक लेखक का अपने देखे हुए और अनुभूत जीवन के बारे में लिखना स्वाभाविक होता है | परन्तु  लेखन जब सृजनशील होता है तब वह अपनी सीमा ही नहीं लांघता , बल्कि अपनी जाति , मत , वर्ग , लिंग , देश आदि का भेद भी लाँघ जाता है | 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आल्ड्स हक्सले

dअंग्रेजी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं आलोचक आल्ड्स  हक्सले  का जन्म 26 जुलाई 1894 को लन्दन के निकट स्थित , उपनगर सरे के एक उच्च माध्यम वर्गीय परिवार में हुआ | हक्सले के पिता लियोनार्ड हक्सले स्वयं भी एक कवी , संपादक एवं जीवनीकार थे | हक्सले की शिक्षा - दीक्षा ईटन कॉलेज बर्कशायर में हुई | 1908 से लेकर 1913 तक हक्सले  बर्कशायर  में ही थे | इस बीच  हक्सले की माँ का देहांत हो गया | हक्सले जब 16 वर्ष के थे तभी उन्हें केराटीटिस पंकटाटा नाम की एक विचित्र बीमारी हो गई | जिसकी वजह से हक्सले पूरी तरह से अंधे हो गये | उनका ये अंधत्व लगभग 18 महीनें चला | गहन चिकित्सा के बाद उनकी आँखों में इतनी भर रौशनी लौटी  की वे कुछ - कुछ पढ़  लिख सकें | इसी बीच उन्होंने अंधत्व की भाषा ( ब्रेल ) भी सीखी | कमजोर दृष्टि के बावजूद हक्सले ने 1913 - 15 के वर्षों में आक्सफोर्ड के बाल्योल कॉलेज से बी , ए पास किया | चाहा तो था हक्सले ने एक वैज्ञानिक बनना मगर फुट पड़ी भीतर से कविता | 1916   में उनकी पहली कविता - संग्रह प्रकाशित हुई | इसी क्रम में आगे के चार वर्षों में दो कविता संग्रह और प्रकाशित हुए | अगर आप लन्दन में स्थित डार्विन हाउस जाएँ तो वहां आपको टामस हेनरी हक्सले का एक चित्र टंगा दिखाई देगा | यह चित्र आल्ड्स हक्सले के  बाबा का है जो डार्विन के सहकर्मी थे | इसी तरह हक्सले मैथ्यू आर्नोल्ड से भी संबंधित थे |तात्पर्य यह की आड्ल्स हक्सले साहित्यकार और वैज्ञानिक की वंश परम्परा में जन्मे अपनी तरह के बौधिक थे , जिनमें  एक वैज्ञानिक , सत्यान्वेषी चिन्तक के गुण मौजूद थे | बीसवीं सदी के तीसरे दशक में वे ब्लम्स्बेरी सोसायटी नामक बौद्धिकों की एक टोली के सम्पर्क में आये | यहाँ उनका परिचय बट्रेंड रसेल से हुआ साथ ही मारिया नसि से भी मुलाकात हुई जिससे उनका विवाह हो गया और कुछ समय बाद  वो एक पुत्र के पिता भी बनें , जिसका नाम रखा गया मैथु हक्सले | ब्लम्स्बेरी  सोसाइटी के सदस्यों के बीच हक्सले के कविता - संग्रह ' द बर्निग व्हील ' ( The Burning wheel ) की रचनाओं को खूब सराहा गया | हक्सले का पहला उपन्यास ' प्वान्ट काउंटर प्वान्ट ' 1928 जबकि ' डू व्हाट यू  विल ' 1929 में प्रकाशित हुआ |
                1937 में हक्सले कैलिफोर्निया आ गये यह सोचकर की वहां का सुहावना मौसम उनकी आँखों के लिए कष्टकर होगा | यहाँ रहते हुए उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाओं में  संशोधन करने का बीड़ा उठाया | यह कार्य भी उन्होंने कुछ वर्ष ही किया | द्वितीय महायुद्ध के खत्म होते - होते हक्सले जिन अन्य तत्वदर्शी साधकों के संपर्क में आए उनमे एक नाम जे . कृष्णामूर्ति का भी लिया जाता है | एक और जहां उनके उपन्यास द ब्रेव न्यू वर्ल्ड , जो उन्होंने बीते वर्षों में लिख कर छपवाया था , पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं यहाँ - वहां छप  रही थीं , वहीँ दूसरी और उनकी रूचि मन के भीतर उठने वाली   तरह - तरह की तरंगों का विवेचन कर  उसके आधार पर निबंध लिखने की और भी हुई | उन्होंने चीत की सहजवृतियों के प्रसरण में उखाड - पछाड़ का जायजा लेने के लिए काफी समय तक मादक द्रव्यों का भी सहारा लिया | डोर्स आफ परसेप्शन नामक उनकी कृति कुछ एसे ही प्रयोगों का परिणाम जान पड़ती है | कृष्णामूर्ति को हम अधुना मूर्धन्य चिंतकों की श्रेणी में रखते हैं | उन्होंने बिना किसी शाश्त्रीय ग्रंथों के सहारा लिए सूत्र शैली में एसे रूपांतरणकारी  व्याख्यान दिए हैं की उनका प्रभाव राबर्ट पावेल एवं एडहर्ड जैसे अमेरिकी गुरुओं पर भी देखा जा सकता है | इन्हीं कृष्णामूर्ति की सुप्रसिद्ध कृति द फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम की भूमिका लिखने के लिए हक्सले ने उनके एक - एक शब्द को गंभीरता से पढ़ा और कहा की मनुष्य एक उभयधर्मी प्राणी है , वह एक साथ दो अलग - अलग तलों पर जीता है | एक तल पर वह ठोस पदार्थपरक दुनिया को सहता है और झेलता है और दूसरी ओर है उसका मनोजगत जहां वह तरह - तरह के प्रतीकों का सहारा लेता है | इन्हीं प्रतीकों के बल पर कला ओर विज्ञानं की दुनियां में तरह - तरह की हलचल होती रहती है , जो अन्तः व्यवहारपरक दुनिया में आस्फलित होता है | कृष्ण मूर्ति कहा करते थे कि हर महत्वकांक्षा समाज विरोधी होती है ओर यदि आदमी सचमुच चाहता है कि समाज में क्लेश न हो तो उसे धर्मगुरुओं  से बचना चाहिए , क्युकी सबका अपना - अपना ईश्वर है |
        इस ईश्वर पर आस्था रखने वाले एक सार्वजानिक व्यवस्था से बंधे हुए समाज में उपद्रव फेलातें हैं | एक तरह कि आस्था वाले , दूसरी तरह के आस्था वालों से घोर शत्रुता वाला व्यव्हार करतें हैं | इसी विचार से उत्प्रेरित होकर हक्सले ने लिखा , सभी तरह के ईश्वर घरेलु उत्पाद यानि होम मेड हैं | शुरू में इन्हें हम ( पुतलियों कि तरह ) डोर खींच कर नचाते हैं सिर्फ इसलिए कि एक दिन हमे ही नचाया जा सके | एक अन्य निबंध में हक्सले लिखते हैं , बोद्धिक मनन , चिन्तन ,  यौन - तृप्ति से कहीं अधिक मूल्यवान होता | हलांकि इसी के साथ हक्सले यह भी कहा करते थे कि एक खराब कृति भी उतना ही श्रम मांगती है जितना कि एक अच्छी कृति | वह भी लेखक कि आत्मा से उतनी ही गंभीरता के साथ प्रस्फुटित होती है जितना कि एक अच्छी कृति | हक्सले के अनुसार लोकतान्त्रिक शासन - व्यवस्था तभी सफल हो सकती है , जब एक तानाशाह उसे पूरी तरह समर्पित , विश्वासपात्र नौकरशाही के माध्यम से पूरी क्रूरता के साथ चलाए | 1961 में हक्सले का घर आग से पूरी तरह राख़ हो गया | विवादस्पद बौद्धिक हक्सले , इस दुर्घटना के बाद लॉस एंजिल्स के अस्पताल में भर्ती हुए | उन्हें केंसर हो चूका था | 22 नवम्बर 1963 को हक्सले ने दम तोड़ दिया | इसी दिन डैलस में कैनेडी कि भी हत्या हुई |