रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मेरे तो गिरधर गोपाल

 मीरा का समय सोलवहीं शती है | राजस्थान के मेड़ता राज्य के राठोर रत्न सिंह के यहाँ उनका जन्म हुआ था | कृष्ण के प्रति उनका लगाव बचपन से ही  गया था | उनका विवाह उदयपुर के राजा भोजराज के साथ हुआ | विवाह के थोड़े समय बाद महाराणा भोजराज का निधन हो गया | मीरा ने तो निधन के पहले कृष्ण को अपना पति मान लिया था | मीरा की भक्ति  माधुर्य भाव की थी | वे प्रियतम कृष्ण के ध्यान में डूबी रहती थी | उस समय कुलवधुओं से अपेक्षा की जाती थी की वे अंत:पुर  से बाहर कदम न रखे | मीरा ने इस आदर्श की बिलकुल प्रवाह नही की | कृष्ण  के प्रति अगाध प्रेम ने उनमे अपार आत्मविश्वास भर दिया था | तमाम वर्जनाओं से बेफिक्र वे साधू संतों की संगती करती | कृष्ण की मूर्ति के समक्ष मंदिर में नाचा करती | राजकुल के लिए ये बेहद अपमान जनक था | राजपरिवार उनके विरुद्ध हो गया | मीरा को तरह - तरह से सताया गया | उन्हें मारने के लिए विष का प्याला लोक स्मृति में दर्ज़  हैं | सारी बाधाएँ मीरा की भक्ति के सामने बेअसर साबित हुई | कृष्ण  के प्रति मीरा की विह्वलता उनके पदों में व्यक्त होती है |
                     मध्य युग में स्त्री का स्वतंत्र व्यक्तित्व समाज के लिए कितना असहाए था , मीरा का जीवन इसका प्रमाण है | मीरा अपने युग की बंदिशों का डटकर मुकाबला करती है | लोकलाज की निरर्थरकता के सम्बन्ध में उन्हें कोई भ्रम नहीं है | वे खुले तोर पर घोषणा करती है _ 
                    ' लोक लाज कुलकानि जगत के दई बहाय जस पानी | 
                          अपने घर का पर्दा करि ले मैं अबला बोरानी | '
                    मीरा के समय के प्राय : सभी महत्वपूर्ण भक्त कवि किसी न किसी संप्रदाय से जुड़े हुए थे | सम्प्रदाय से जुडाव सुरक्षा का अहसास करता था | मीरा ने इस सुरक्षा को भी नहीं स्वीकारा | वे आजीवन सम्प्रदाय - निरपेक्ष बनी रहीं | मीरा के गुरु के रूप में रैदास का नाम लिया जाता है | लेकिन यह मान्यता असंदिग्ध नहीं है | मीरा की पदावली का सम्पादन कई विद्वानों ने किया है | मीरा के पदों की भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज  भाषा है | कहीं - कहीं विशुद्ध ब्रजभाषा भी दिखाई देती है |
                  संकलित पद में मीरा ने कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम की कथा कही है | कृष्ण ही उनके सर्वस्य हैं  | दूसरा कोई आश्रय नहीं | कृष्ण के लिए उन्होंने बंधू - बांधव सबको तज़ दिया है | संतों के सानिध्य में उन्हें सुख मिलता है और संसारिकता के घेरे में दु:ख | विरह जनित आंसुओं ने उनकी प्रेम बेल को सींचा है | यह प्रेम ही जीवन का सार तत्व है | लोकापवाद ( लोगो द्वरा की गई बात ) की चिंता क्यु की जाये ? मीरा की भाषा प्रभावपूर्ण है | पद रचना में शास्त्रीय नियमों की बहुत प्रवाह नहीं करती |

मेरे तो गिरधर गोपाल , दुसरो न कोई |
जाके सर मोर मुकुट , मेरो पति सोई |
तात  मात  भ्रात  बंधु , आपनो न कोई ||
छाडि  देई कुल की कानी , कहा करै कोई |
संतन ढिंग बैठी  बैठी , लोक- लाज खोई ||
चुनरी  के किये टूक , ओढ़ी लीन्हीं लोई |
मोती मुंगे उतारि , बन माला पोई ||
अंसुअन जल सींचि - सींचि  , प्रेम - बेलि बोई |
अब तो बेलि फैली गई  , आनंद फल होई ||
प्रेम की मथनियां , बड़े जतन से विलोई |
घृत - घृत सब काढी लियो , छाछ पीओ कोई ||
भगत देखि राजी भई , जगत देखि रोई |
दासी मीरा लाल गिरधर , तारो अब मोहि ||

महाभारत :

'भारतीय परम्परा में रामायण तथा महाभारत को अत्यधिक महत्व प्राप्त है | इन्हें उपजीव्य काव्य कहा जाता है | उपजीव्य कहने का अर्थ यह है की ये ग्रन्थ  परवर्ती रचनाओं के स्त्रोत रहे हैं | संस्कृत काव्य - परम्परा के अतिरिक्त भारत की दूसरी भाषाओँ के रचनाकारों ने रामायण तथा महाभारत के आधार पर अनगिनत काव्यों की रचना की है | हमारे सांस्कृतिक मानस के निर्माण में इन कृत्यों की उल्लेखनीय भूमिका है |
               रामायण को काव्य कहा जाता है और महाभारत  को ' इतिहास ' | यहाँ इतिहास का मतलब एसे  पूर्ववृत से है जिसके माध्यम से धर्म  , अर्थ , काम और मोक्ष का उपदेश दिया जा सके | रामायण को महाभारत  से प्राचीनतर  माना जाता है | वाल्मीकि द्वारा रचित ' रामायण ' की कथा से महाभारतकार  न केवल परिचित है बल्कि वह रामकथा प्रसंगानुकुल प्रस्तुत भी करता है | रामकथा का वर्णन ' आरण्यक ' द्रोण और ' शांतिपर्व ' में मिलता है |' शांतिपर्व ' में प्राप्त रामोपाख्यान सबसे अधिक विस्तृत  है | इसकी व्याख्या शोकाकुल युधिष्ठिर को ऋषि मार्कण्डेय सुनाते हैं | वेद व्यास को महाभारत  का रचनाकार माना जाता है | वेद व्यास का पूरा नाम कृष्ण दैव्पायन व्यास है | वे सत्यवती तथा पराशर के पुत्र थे | यमुना के किसी द्वीप में पैदा होने के कारण उन्हें ' ' दैव्पायन ' , शरीर  के रंग के कारण ' कृष्ण मुनि ' तथा वेद का सहिंताओं  के रूप में विस्तार करने के कारण वेद व्यास कहा जाता है |  महाभरत युद्ध और ' महाभारत  ' ग्रन्थ की रचना के समय को लेकर विद्वानों में पर्याप्त विवाद है | ज्यादातर माना जाता है की महाभारत  की रचना बुद्धपूर्व युग में हो चुकी थी | बुद्ध  का समय छठी शताब्दी ईसा पूर्व है |
                  वर्तमान महाभारत  में एक लाख श्लोक मिलते हैं | इसी से इसे शतसहस्त्र संहिता भी कहते हैं | विद्वानों का विचार है की यह किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं हो सकती | दुसरे रचनाकारों ने समय -समय पर इसके कलेवर में वृद्धि की होगी | इस ग्रन्थ के विकास के तीन क्रमिक चरण माने जाते हैं ___ जय , भारत तथा महाभारत  | मूल ग्रन्थ ' जय ' के रचनाकार महर्षि वेद व्यास हैं | इसी का विस्तार करते हुए वेश्म्पायन ने ' ' भारत '  तथा सोति ने ' महाभारत ' का प्रणयन किया | महाभारत  में अठारह पर्व हैं | अपने वृहदाकार ( बहुत बड़ा आकर ) और तमाम विषयों के समावेश के कारण इसे विश्व कोष कहा जाता है | इस ग्रन्थ की बहुत सी टीकाएँ की गई हैं | इसकी विशालता को लक्षित करके ये कहना उचित  जान पड़ता है की ' इस ग्रन्थ में जो कुछ है वह अन्यत्र ( दूसरी जगह ) है , परन्तु जो कुछ इसमें नहीं है वह कहीं  और भी नहीं है | ' प्राचीन राजनीती , लोक -व्यव्हार  को जानने का सबसे विस्तृत और सरल तरीका ' महाभारत ' ही है | इसे पंचमवेद  भी कहा जाता है |
   

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

रामायण

संस्कृत साहित्य में ' रामायण ' को ' आदिकाल ' कहा जाता है तथा इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि   को ' आदिकवि ' | वाल्मीकि  के जीवन के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता | प्रसिद्ध है की वाल्मीकि  पहले लूटमार से अपने परिवार का भरण - पोषण करते थे | ऋषियों के एक समूह से मिलने के बाद उनके जीवन दिशा बदल गई और वे तप- साधना , ज्ञानचर्या में प्रवृत हो गये | वाल्मीकि   के कवि बनने की कहानी काम - मोहित क्रोंच पक्षी के मारे जाने से जुडी है | जब एक शिकारी ने मैथुनरत  क्रोंच पक्षी - युगल पर बाण चलाकर नर क्रोंच को मार दिया तो क्रोची विलाप करने लगी | क्रोंची का करुण स्वर सुनकर वाल्मीकि  शोक विह्वल  हो गए | शोकाकुल महर्षि के मुख से जो वाणी फूटी उसे श्लोक कहा गया | इस श्लोक का भावार्थ था ' हे व्याध ! तुमने काम मोहित इस क्रोंच पक्षी को मारा हे , अत: तुम कभी प्रतिष्ठा न प्राप्त करो | ' वाल्मीकि ने जो राम कथा लिखी उसमें वे स्वंम उपस्थित हैं | सीता और उनके दो पुत्रों कुश तथा लव का पालन - पोषण वाल्मीकि के ही आश्रम में होता हे |
                          रामायण के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं  | मर्यादा - पुरुष के रूप में राम वैदिक परम्परा में तो विख्यात हैं हीं , इसके साथ जैन तथा  बोद्ध परम्पराओं में भी उन्हें स्थान दिया गया हे | लोक में राम की प्रसिद्धी बहुत प्राचीन है | विंटरनित्स का विचार है की रामायण का मूल स्वरूप ईसा पूर्व चोथी शताब्दी में तैयार हुआ तथा इसका अंतिम स्वरुप दूसरी शताब्दी ईस्वी के लगभग निश्चित हुआ | कुछ विद्वान उत्तर काण्ड को तथा बालकाण्ड के कुछ हिस्सों को वाल्मीकिकृत न मानकर प्रक्षिप्त बताते  हैं | जर्मन विद्वान याकोबी मूल रामायण में पांच ही काण्ड स्वीकारते है - अयोध्या से लेकर उत्तरकाण्ड तक | जो हो , रामायण के उपलब्ध  वर्तमान स्वरुप का कथा विन्यास शिथिल या अस्त - व्यस्त नहीं है | रामायण के श्लोकों की कुल संख्या चौबीस हज़ार है जिससे इसे ' चतुर्विंशति सहस्त्री सहिंता ' कहते है | ' रामायण ' में प्रायेह अनुष्टुप छंद का व्यवहार हुआ है | वाल्मीकि इस छंद के आविष्कारक माने जाते हैं | रामायण का पाठ कई  रूपों में मिलता है | आजकल इसके तीन पाठ प्रचलित हैं | दक्षिणात्य पाठ , गोंडीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ |   
       

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

होंसलों की उड़ान


आप कुछ भी कर पाने मे सक्षम हैं , 
फिर चाहे वो आपकी सोच हो , 
आपका जीवन हो आपके सपने 
हों सब सच हो सकते हैं | 
आप जो चाहे वह कर सकते हैं | 
आप इस अन्नत ब्रह्मांड की तरह
ही अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण हैं | 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

मोहब्बत




दिल की किताब मैं गुलाब उनका था ,
रात की नींद मै भी ख्वाब उनका था ,
कितना प्यार करते हो जब हमने पूछा ,
मर जायेंगे तुम्हारे बिना ये जवाब उनका था |

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

यैस ( हाँ )

तर्क का उद्देश्य केवल तार्किक ढंग से ना कहना होता है |
हम ना कहना चाहतें हैं और फिर उसे सिद्ध करने के लिए 
प्रमाण जुटाते हैं , कारण इकट्ठा करते हैं _ यही तर्क का खेल 
होता है |
यैस ( हाँ ) कभी तार्किक मन को आकर्षित नहीं करता ,
वह केवल हृदय को आकर्षित करता है | और अन्तत: केवल 
हृदय जीतता है , यैस जीतता है _ तर्क कभी नहीं |