गुरुवार, 30 सितंबर 2010

दस्तूर



वो सर बुलंद रहा और खुद पसंद रहा ,
मै सर चुकाए रहा और खुशमदो मै रहा !
मेरे अज़ीज़ो यही दस्तूर है मकानों का ,
बनाने  वाला हमेशा बरामदो मै रहा !

फुर्सत



 तुम्हें गेरों से कब फुर्सत हम गम से कब ख़ाली
चलो  हो चूका मिलना न तुम ख़ाली न हम ख़ाली !

गम



मुस्कराहट पर छिपाते हैं जो अपना गम ,
अपनी हालत पे वो गेरो को रुला देते हैं !

प्यार



क्या करेगा प्यार वो ईमान को ,
क्या करेगा प्यार वो भगवान को !
जन्म लेकर गोद मै इन्सान की ,
कर न पाया प्यार जो इन्सान को !

गुज़ारिश



बिजली गिराने वाले तू बिजली वहां गिरा !
जिस शाख पर किसी का आशियाँ   न  हो !

रहमत



खुशामद  से , अदब से न मेहनत से मिलती है ! 
मोहबत एसी दोलत है जो तेरी रहमत से मिलती है !