रविवार, 17 अप्रैल 2011

कामयाबी यों ही नहीं मिलती... बिल गेट्स

क्या आपमें है कुछ कर गुजरने की तमन्ना ? क्या आपके पास कोई मकसद , कोई विजन , कोई आइडिया ? यदि एसा कोई लक्ष्य नहीं है , तो घर बैठिए | और अगर आपका जवाब हाँ है तो , अपनी योग्यता को आंकिए और अपने काम में जुट जाइए |
              बिल गेट्स दुनियां के सबसे अमीर लोगों में से हैं | वह महादानी भी हैं | 28 अक्तूबर 1955 को इनका जन्म हुआ था , लेकिन 32  साल पुरे होने के पहले ही 1987 में उनका नाम अरबपतियों की फ़ोर्ब्स की सूचि में आ गया और कई साल तक वो इस लिस्ट में नम्बर वन पर भी रहे | 2007 में उन्होंने 40 अरब डालर ( लगभग 176 अरब रूपये ) दान में दिए | बिल गेट्स माइक्रोसाफ्ट के चेयरमैन हैं , जिसका साल 2010 का  करोबार 63 अरब डालर और मुनाफा करीब 19 अरब डालर था | आंखिर क्या है बिल गेट्स की कामयाबी  का मन्त्र ?
उच्च जीवन उच्च विचार :::::::::
            बिल गेट्स खाते - पीते घर के हैं | स्कूल में उन्होंने 1600 में से 1590 नंबर पाए थे पढाई के दौरान ही कंप्यूटर  प्रोग्राम बनाकर उन्होंने 4 , 200 डालर कमा  लिए थे और टीचर से कहा था कि मैं 30 वर्ष कि उम्र में करोडपति बनकर दिखाऊंगा और 31 वर्ष में वह अरबपति बन गये | वह विलासितापुर्वक नहीं रहते , लेकिन वह व्यवस्थित जीवन जीते हैं | डेढ़ एकड़ के उनके बंगले  में सात बेडरूम , जिम स्विमिंग पूल थियेटर आदि हैं | पन्द्रह साल पहले उसे करीब 60 लाख डालर में खरीदा था | उन्होंने लियोनार्दो दी विंची के पत्रों , लेखों को तीन करोड़ डालर में खरीदा था | ब्रिज , टेनिस और गोल्फ के खिलाडी बिल गेट्स अपने तीन बच्चों के लिए अपनी पूरी जायदाद छोड़कर नहीं जाना चाहते , क्युकी उनका मानना है कि अगर मैं अपनी संपत्ति  का एक प्रतिशत भी उनके लिए छोड़ दूँ तो वह काफी होगा | उन्होंने दो किताबें भी लिखीं हैं , द रोड अहेड और बिजनेस @ स्पीड ऑफ़ थोट्स |
           साल 1994 में उन्होंने अपने कई शेयर्स बेच दिए और एक ट्रस्ट बना लिया , जबकि उन्होंने 2000 में  अपने तीन ट्रस्टों को मिलाकर एक कर दिया और पूरी पारदर्शिता से दुनियां भर में जरूरतमंद लोगों की मदद करने लगे | बिल गेट्स की कमी , एकाधिकारी व्यवसायिक निति और प्रतिस्पर्द्धा उन्हें बार - बार विवादों में भी धकेलती रही है | 16 साल तक अरबपतियों की सूचि में नंबर वन रह चुके बिल गेट्स अपनी कामयाबी के सूत्र इस तरह बताते हैं |
दुनिया बदलो या घर बेठो ::::::
           क्या आपमें है कुछ कर गुजरने की तमन्ना ? क्या आपके पास है कोई मकसद , कोई विजन , कोई आइडिया , कोई इनोवेशन ? यदि कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है , तो अपने घर बैठिये और अगर आपका जवाब हाँ में है तो अपनी योग्यता को आंकिये और अपने काम में जुट जाइये |
रस्ते खुद बनाओ ::::::::
            आज जो भी रास्तें हैं , वे हमेशा से नहीं थे | किसी न किसी ने तो उन्हें बनाया ही है | नये रस्ते बनाने की कोशिश पर हो सकता की लोग आपको सनकी कहें , पर आप डिगे नहीं | जब मैनें हर डेस्क पर और हर घर में कम्प्यूटर  की कल्पना की , तब किसी को इस बात की कल्पना नहीं थी | मुझे भरोसा था की कम्प्यूटर  हम सबकी जिंदगी को बदलकर रख देगा |
उसूलों पर डेट रहो :::::::
            कभी भी अपने सिद्धांत से न हटें | याद रखिये सभी लोग केवल धन के लिए काम नहीं करते | मेरे साथ जितने भी लोगों ने काम शुरू किया था वे सभी जानते थे कि वे धन कमानें के लिए नहीं बल्कि लोगों कि जिंदगी बेहतर बनाने के लिए काम कर रहें हैं | हम टेक्नलोजी कि मदद से लोगों के जीवन को आसान बनाना चाहते थे , और वह हमने कर दिखया | यह धन कमानें से ज्यादा बड़ा काम है |
हमेशा आगे कि सोचो ::::::::
             दुनियां तेज़ी से बदल रही है | अगर आप आगे कि नहीं सोच सकते , तो पिछड़ जायेंगें | आपको संभलने का वक़्त भी नहीं मिल पायेगा | आपको खेल में आगे आने के लिए और यहाँ तक कि खेल में बनें रहने के लिए आगे कि बातें सोचनी होंगी | इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ ही बाज़ार कि जरूरतें क्या - क्या रहेंगीं , यह जानना आवश्यक है |
सही लोगों को साथ लें ::::::::
             कोई भी प्रतिभा किसी कार्य को सही अंजाम तभी दे सकती है , जब उसे सही लोगों का साथ मिले | अगर आपमें बहुत प्रतिभा है , लेकिन सहकर्मी और नियोक्ता आपका साथ न दें तो नतीजा क्या होगा ? ऊँचें लक्ष्य को लेकर सर्वश्रेष्ठ योग्यता से काम करने वाले लोग ही कामयाबी पा सकते हैं | अगर मेरे साथ पल एलेन और स्टीव बालमेर जैसे प्रतिभाशाली और विलक्षण मित्र तथा सहकर्मी नहीं होते , जो मेरी कमियों को दूर कर देते थे तो आज मैं इस जगह नहीं पहुंच पाता |
सिस्टम बनाएं ::::::::
            कोई भी काम करने के लिए एक सिस्टम जरूरी है जिससे कि सारे काम आसानी से हो सकें | यह सिस्टम माइक्रो या मेक्रो हो सकता है जरूरी नहीं कि हम  ही सिस्टम बनाएं , आप कोई भी अच्छा सिस्टम बना सकतें हैं , पर यह ध्यान रखिये कि कहीं ये सिस्टम अनुत्पादकता  को तो नहीं बढ़ा  रहा ?
समस्याओं को टुकड़ों में हल करो :::::
           किसी भी समस्या को दूर करने के लिए बारीकी से समझना जरूरी है | हो सकता है कि वह समस्या एक झटके में न दूर हो सके , ऐसे में उसे टुकड़ों में बात कर हल किया जा सकता है | इस तरीके से बड़ी से बड़ी और तात्कालिक समस्याओं से भी पार पाया जा सकता  है |
नाकामी को भी मत भूलो :::::::
            अपनी हर कामयाबी  का जश्न जरुर मनाओ , जिससे आपको अपनी कामयाबी पर नाज़ हो और आप हर कामयाबी को पाना चाहें , लेकिन कभी भी अपनी नाकामी को भी मत भूलो | अपनी नाकामियों से सबक सीखो और उसे दोहरानें से हमेशा बचो |

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

संघर्ष और साधना का नाम भैरप्पा

     वर्ष 2010 के लिए सरस्वती सम्मान से विभूषित कन्नड़ साहित्यकार   भैरप्पा ने जिंदगी के कई रूप देखे | उनके लेखन में इन कठिन अनुभवों के साथ उनके गहन अध्ययन का आधार दिखाई देता है |
कन्नड़ के प्रसिद्ध साहित्यकार संथेशिवारा लिंग्नय्या  भैरप्पा को उनके चर्चित उपन्यास ' मंद्र ' के लिए वर्ष 2010 का सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया था | भैरप्पा का नाम आधुनिक कन्नड़ - साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों में शुमार है | वास्तविकता यह है की आज वे कन्नड़ भाषा व् साहित्य की परिधि को लाँघ कर न सिर्फ अखिल भारतीय स्तर पर मान्य  हो चुकें हैं बल्कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पर्याप्त चर्चा हुई है | उनकी कृतियाँ लगभग सभी प्रमुख भाषाओँ के आलावा अंग्रेजी समेत कई विदेशी भाषाओँ में अनुदित हो चुकी है | हिंदी में तो उनके लगभग सभी  उपन्यासों का अनुवाद उपलब्ध है | शिवराम कारंत के बाद यू . आर . अनंतमूर्ति के आलावा भैरप्पा संभवत : अकेले एसे उपन्यासकार है जिन्हें हिंदी पाठकों के बीच काफी लोकप्रियता मिली है |
      भैरप्पा के अभी तक 22 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं उनकी आलोचना - चिंतन की दो पुस्तकें  छप चुकीं हैं | इसके आलावा उनकी आत्मकथा  ' भित्ति ' भी प्रकाशित हो चुकी है इनसे अलग भी उन्होनें काफी कुछ लिखा है | लेकिन ये एक निर्विवाद तथ्य है की उन्हें व्यापक स्वीकृति एक उपन्यासकार के रूप में ही मिली है | उनका पहला उपन्यास है ' भीमकाय ' जो 1959 में छपा था , जबकि उनका नवीनतम उपन्यास ' आवरण ' 2010 में सबके सामने आया | इनके जिन उपन्यासों की  विशेष  चर्चा होती है , उनमें धर्मश्री, गृहभंग , वंशवृक्ष , दाटू ( उन्लंघन ) , पर्व तब्ब्ली ( गोधुली ) , तंतु साक्षी , सार्थ अदि शामिल हैं |
       भैरप्पा के उपन्यास जिन प्रश्नों से टकराते नज़र आते हैं उनमें धर्म , लोकाचार , सनातनता , जाति, जीवन  की सार्थकता जैसे मुद्दे प्रमुख हैं | ' गृहभंग ' में कथा के स्तर पर प्रत्यक्ष रूप से कोई पुर्वनियोजन किये बिना उन्होनें समाज और परिवार का चित्रण किया है | ' वंशवृक्ष ' में उन्होनें सनातन धर्म के मूल्यों की सार्थकता पर विचार किया है | इससे पूर्व ' गोधूलि ' में उन्होनें पूर्व और पश्चिम की सांस्कृतिक मूल्यों की टकराहट पर कलम चलाई थी | ' दाटू ' में उन्होनें जाति व्यवस्था की उलझनों पर रोशनी  डाली है |
         ' पर्व ' में उन्होंने महाभारत में कथासूत्र को लेकर आधुनिक सन्दर्भों  में उसकी विवेचना की है | उनके साहित्य में जिस चीज़ पर सबसे पहले ध्यान जाता है वह है परम्परा और शास्त्रों के प्रति उनका प्रश्नाकुल लगाव और आधुनिकता के प्रति उनकी आलोचनात्मक दृष्टि | परम्परा और आधुनिकता के बीच के संघर्ष का चित्रण उनके साहित्य को समझने का मुख्य सूत्र हो सकता है | उनके प्राय सभी उपन्यासों में इस विशेषता का समावेश देखा जा सकता है | वे आधुनिक होने के लिए परम्परा को खरिज करने के विचार से परहेज करते हैं | वास्तव में वे परम्परागत मूल्यों का वर्तमान के संदर्भ में प्रत्याख्यान करते हैं | यही उनकी रचनाशीलता का उलेखनीय पक्ष है जो उन्हें महत्वपूर्ण साबित करने के साथ - साथ विवादास्पद भी बनाता है |
     उनका समूचा साहित्य व्यक्तिगत अनुभवों और व्यापक अध्ययन की बुनियाद पर खड़ा है | उनका जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ | 1934 में पुराने मैसूर राज्य के एक मामूली गाँव में जन्में भैरप्पा महज 11 साल की उम्र में अनाथ  हो गये थे | इस कारण  शुरू से ही उन्हें दो जून के भोजन के इंतजाम के लिए भटकना पड़ा | छोटे - मोटे काम करते हुए उनहोंने किसी तरह पढाई जारी रखी | मक्सिम गोर्की और वैकम मोहम्मद बशीर की तरह उन्होंने भी खुद को बचाए रखने के लिए बेहिसाब पापड़ बेले | उन्होंने बांबे सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम किया , तांगा चलाया ,रेस्टोरेंट में वेटर का काम किया , सिनेमाघर में गेटकीपर का काम किया ,मेले में शर्बत की दुकान खोली और घूम - घूम कर अगरबतियाँ  बेचीं  | इस तरह उनके जीवन का खाता संघर्षों के अनगिनत प्रसंगों से भरा हुआ है | मगर इसका दूसरा पक्ष भी है संघर्षों  के बीच भी उन्होंने जमकर अध्ययन भी किया नतीजतन उन्हें मैसूर में अध्यापकी का काम मिला | बाद में वे एन . सी . ई . आर टी , दिल्ली में शिक्षा अधिकारी भी बने | उन्होंने दर्शनशास्त्र के साथ - साथ कला , संगीत और सोंदर्यशास्त्र का विशद अध्ययन किया है , जिसका प्रभाव उनकी कृतियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है |
         उनके एक शुरुवाती उपन्यास ' धर्मश्री ' ( 1960 ) की कथाभूमि में संगीत का परिवेश वर्णित है , तो 2002 में प्रकाशित ' मंद्र ' में भी संगीत की मौजूदगी है | सरस्वती सम्मान से सम्मानित ' मंद्र ' में भैरप्पा ने एक बार फिर मूल्य और नैतिकता के प्रश्नों को उठाया है | अपनी छात्रा के प्रति एक शिक्षक का आकर्षण और छात्रा का अपने पति के प्रति नैतिकता के द्वन्द को लेकर रचे गये इस उपन्यास में कला बनाम नैतिकता का पुरातन प्रश्न मुखर हो उठा है |
        साहित्य के संदर्भ में एक चीज़ की अक्सर चर्चा होती है वह है ' पोलिटिकली करेक्ट ' होने का प्रश्न | भैरप्पा के सन्दर्भ में यह अत्यंत महत्वपूर्ण  है | भैरप्पा ने गलत कहे जाने का जोखिम उठाकर भी अपनी बात कही है | उनका मानना है की साहित्य - सृजन सामूहिक काम नहीं होता | यह एक आन्दोलन भी नहीं है | प्रत्येक को अपनी भावना को और दृष्टिकोण के अनुसार अपने आप लिखने का काम करना चाहिए  | इसलिए इसमें नेतृत्व करने का प्रश्न  ही नहीं आता | साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि एक लेखक का अपने देखे हुए और अनुभूत जीवन के बारे में लिखना स्वाभाविक होता है | परन्तु  लेखन जब सृजनशील होता है तब वह अपनी सीमा ही नहीं लांघता , बल्कि अपनी जाति , मत , वर्ग , लिंग , देश आदि का भेद भी लाँघ जाता है | 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आल्ड्स हक्सले

dअंग्रेजी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं आलोचक आल्ड्स  हक्सले  का जन्म 26 जुलाई 1894 को लन्दन के निकट स्थित , उपनगर सरे के एक उच्च माध्यम वर्गीय परिवार में हुआ | हक्सले के पिता लियोनार्ड हक्सले स्वयं भी एक कवी , संपादक एवं जीवनीकार थे | हक्सले की शिक्षा - दीक्षा ईटन कॉलेज बर्कशायर में हुई | 1908 से लेकर 1913 तक हक्सले  बर्कशायर  में ही थे | इस बीच  हक्सले की माँ का देहांत हो गया | हक्सले जब 16 वर्ष के थे तभी उन्हें केराटीटिस पंकटाटा नाम की एक विचित्र बीमारी हो गई | जिसकी वजह से हक्सले पूरी तरह से अंधे हो गये | उनका ये अंधत्व लगभग 18 महीनें चला | गहन चिकित्सा के बाद उनकी आँखों में इतनी भर रौशनी लौटी  की वे कुछ - कुछ पढ़  लिख सकें | इसी बीच उन्होंने अंधत्व की भाषा ( ब्रेल ) भी सीखी | कमजोर दृष्टि के बावजूद हक्सले ने 1913 - 15 के वर्षों में आक्सफोर्ड के बाल्योल कॉलेज से बी , ए पास किया | चाहा तो था हक्सले ने एक वैज्ञानिक बनना मगर फुट पड़ी भीतर से कविता | 1916   में उनकी पहली कविता - संग्रह प्रकाशित हुई | इसी क्रम में आगे के चार वर्षों में दो कविता संग्रह और प्रकाशित हुए | अगर आप लन्दन में स्थित डार्विन हाउस जाएँ तो वहां आपको टामस हेनरी हक्सले का एक चित्र टंगा दिखाई देगा | यह चित्र आल्ड्स हक्सले के  बाबा का है जो डार्विन के सहकर्मी थे | इसी तरह हक्सले मैथ्यू आर्नोल्ड से भी संबंधित थे |तात्पर्य यह की आड्ल्स हक्सले साहित्यकार और वैज्ञानिक की वंश परम्परा में जन्मे अपनी तरह के बौधिक थे , जिनमें  एक वैज्ञानिक , सत्यान्वेषी चिन्तक के गुण मौजूद थे | बीसवीं सदी के तीसरे दशक में वे ब्लम्स्बेरी सोसायटी नामक बौद्धिकों की एक टोली के सम्पर्क में आये | यहाँ उनका परिचय बट्रेंड रसेल से हुआ साथ ही मारिया नसि से भी मुलाकात हुई जिससे उनका विवाह हो गया और कुछ समय बाद  वो एक पुत्र के पिता भी बनें , जिसका नाम रखा गया मैथु हक्सले | ब्लम्स्बेरी  सोसाइटी के सदस्यों के बीच हक्सले के कविता - संग्रह ' द बर्निग व्हील ' ( The Burning wheel ) की रचनाओं को खूब सराहा गया | हक्सले का पहला उपन्यास ' प्वान्ट काउंटर प्वान्ट ' 1928 जबकि ' डू व्हाट यू  विल ' 1929 में प्रकाशित हुआ |
                1937 में हक्सले कैलिफोर्निया आ गये यह सोचकर की वहां का सुहावना मौसम उनकी आँखों के लिए कष्टकर होगा | यहाँ रहते हुए उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाओं में  संशोधन करने का बीड़ा उठाया | यह कार्य भी उन्होंने कुछ वर्ष ही किया | द्वितीय महायुद्ध के खत्म होते - होते हक्सले जिन अन्य तत्वदर्शी साधकों के संपर्क में आए उनमे एक नाम जे . कृष्णामूर्ति का भी लिया जाता है | एक और जहां उनके उपन्यास द ब्रेव न्यू वर्ल्ड , जो उन्होंने बीते वर्षों में लिख कर छपवाया था , पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं यहाँ - वहां छप  रही थीं , वहीँ दूसरी और उनकी रूचि मन के भीतर उठने वाली   तरह - तरह की तरंगों का विवेचन कर  उसके आधार पर निबंध लिखने की और भी हुई | उन्होंने चीत की सहजवृतियों के प्रसरण में उखाड - पछाड़ का जायजा लेने के लिए काफी समय तक मादक द्रव्यों का भी सहारा लिया | डोर्स आफ परसेप्शन नामक उनकी कृति कुछ एसे ही प्रयोगों का परिणाम जान पड़ती है | कृष्णामूर्ति को हम अधुना मूर्धन्य चिंतकों की श्रेणी में रखते हैं | उन्होंने बिना किसी शाश्त्रीय ग्रंथों के सहारा लिए सूत्र शैली में एसे रूपांतरणकारी  व्याख्यान दिए हैं की उनका प्रभाव राबर्ट पावेल एवं एडहर्ड जैसे अमेरिकी गुरुओं पर भी देखा जा सकता है | इन्हीं कृष्णामूर्ति की सुप्रसिद्ध कृति द फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम की भूमिका लिखने के लिए हक्सले ने उनके एक - एक शब्द को गंभीरता से पढ़ा और कहा की मनुष्य एक उभयधर्मी प्राणी है , वह एक साथ दो अलग - अलग तलों पर जीता है | एक तल पर वह ठोस पदार्थपरक दुनिया को सहता है और झेलता है और दूसरी ओर है उसका मनोजगत जहां वह तरह - तरह के प्रतीकों का सहारा लेता है | इन्हीं प्रतीकों के बल पर कला ओर विज्ञानं की दुनियां में तरह - तरह की हलचल होती रहती है , जो अन्तः व्यवहारपरक दुनिया में आस्फलित होता है | कृष्ण मूर्ति कहा करते थे कि हर महत्वकांक्षा समाज विरोधी होती है ओर यदि आदमी सचमुच चाहता है कि समाज में क्लेश न हो तो उसे धर्मगुरुओं  से बचना चाहिए , क्युकी सबका अपना - अपना ईश्वर है |
        इस ईश्वर पर आस्था रखने वाले एक सार्वजानिक व्यवस्था से बंधे हुए समाज में उपद्रव फेलातें हैं | एक तरह कि आस्था वाले , दूसरी तरह के आस्था वालों से घोर शत्रुता वाला व्यव्हार करतें हैं | इसी विचार से उत्प्रेरित होकर हक्सले ने लिखा , सभी तरह के ईश्वर घरेलु उत्पाद यानि होम मेड हैं | शुरू में इन्हें हम ( पुतलियों कि तरह ) डोर खींच कर नचाते हैं सिर्फ इसलिए कि एक दिन हमे ही नचाया जा सके | एक अन्य निबंध में हक्सले लिखते हैं , बोद्धिक मनन , चिन्तन ,  यौन - तृप्ति से कहीं अधिक मूल्यवान होता | हलांकि इसी के साथ हक्सले यह भी कहा करते थे कि एक खराब कृति भी उतना ही श्रम मांगती है जितना कि एक अच्छी कृति | वह भी लेखक कि आत्मा से उतनी ही गंभीरता के साथ प्रस्फुटित होती है जितना कि एक अच्छी कृति | हक्सले के अनुसार लोकतान्त्रिक शासन - व्यवस्था तभी सफल हो सकती है , जब एक तानाशाह उसे पूरी तरह समर्पित , विश्वासपात्र नौकरशाही के माध्यम से पूरी क्रूरता के साथ चलाए | 1961 में हक्सले का घर आग से पूरी तरह राख़ हो गया | विवादस्पद बौद्धिक हक्सले , इस दुर्घटना के बाद लॉस एंजिल्स के अस्पताल में भर्ती हुए | उन्हें केंसर हो चूका था | 22 नवम्बर 1963 को हक्सले ने दम तोड़ दिया | इसी दिन डैलस में कैनेडी कि भी हत्या हुई | 

गुरुवार, 31 मार्च 2011

महादेवी वर्मा

आज के नारी  उत्थान  के युग में महादेवी जी ने न केवल साहित्य सृजन के माध्यम से अपितु नारी कल्याण सम्बन्धी अनेकों संस्थाओं को जन्म एवं प्रश्रय देकर इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है | महादेवी जी , जहां एक श्रेष्ठ कवयित्री थीं वहीँ  मौलिक गद्यकार  भी |
जीवन परिचय ____ महादेवी जी का जन्म फरुर्खाबाद   में सन 1907 ईस्वी में हुआ था | इनके पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा इंदौर के एक कालेज में प्रोफ़ेसर थे | महादेवी जी की प्रारंभिक शिक्षा का श्री गणेश यहीं से हुआ था | इनकी माता हेमरानी एक भक्त एवं विदुषी महिला थी | इनकी  भक्ति भावना का प्रभाव महादेवी वर्मा पर भी पड़ा | छटी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् 1920 ईस्वी  में प्रयाग में मिडिल  पास किया | इसके चार साल बाद हाई स्कुल और 1926 ईस्वी में दर्शन विषय लेकर इन्होने एम. ए. की परीक्षा पास की एम . ए पास करने के पश्चात् महादेवी वर्मा जी ' प्रयाग महिला विद्या  पीठ ' में प्रधानाचार्य  के पद पर नियुक्त हुई और मृत्युपर्यंत इसी पद पर कार्य करती रहीं | अपनी साहित्यिक एवं सामाजिक सेवाओं के कारण ये  उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या भी मनोनीत की गई | 11 सितम्बर 1987 ईस्वी को इलाहाबाद में इनका देहांत हुआ |
रचनाएँ __ महादेवी जी प्रसिद्धि विशेषत: कवित्री के रूप में हैं परन्तु ये  मौलिक गद्यकार भी हैं | इन्होनें  बड़ा चिन्तन पूर्ण , परिष्कृत गद्य लिखा हैं | महादेवी जी की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं :
निहार , रश्मि , नीरजा , सांध्य गीत और दीपशिखा  |
यामा पर इन्हें ' भारतीय ज्ञानपीठ ' पुरस्कार प्राप्त हुआ था |
प्रमुख गद्य रचनाएँ __ ( 1 ) पथ के साथी , ( 2 ) अतीत  के चलचित्र , ( 3 ) स्मृति की रेखाएं , ( 4 ) श्रृंखला की कड़ियाँ |
साहित्यिक विशेषताएं ___ महादेवी वर्मा की काव्य - रचना के पीछे एक ओर स्वाधीनता आन्दोलन की प्रेरणा है  , तो दूसरी ओर भारतीय समाज में स्त्री जीवन की वास्तविक स्थिति का बोध भी है | यही कारण है की उनके काव्य में जागरण की चेतना के साथ स्वतंत्रता की कामना की अभिव्यक्ति है और दुःख की अनुभूति के साथ करुणा  के बोध की भी | दुसरे छायावादी कवियों की तरह महादेवी वर्मा के गीतों में भी प्रक्रति सोंदर्य के अनेक प्रकार के अनुभवों की व्यंजना हुई है महादेवी वर्मा के गीतों में भक्तिकाल के गीतों की प्रतिध्वनी है और लोक गीतों की अनुगूँज भी , लेकिन इन दोनों के साथ ही उनके गीतों में आधुनिक बौद्धिक मानव के द्वंदों की अभिव्यक्ति ही प्रमुख है |
          विषय की दृष्टि से महादेवी जी की रचनाओं को दो भागों में बांटा जा सकता है __ (  1 ) विचारात्मक एवं विवेचना प्रधान , ( 2 ) पीड़ा  , क्रंदन , अंतसंघर्ष , सहानुभूति एवं संवेदना प्रधान | ' श्रृंखला की कड़ियाँ ' तथा ' महादेवी का विवेचनात्मक गद्य ' इनकी विवेचना प्रधान रचनाएँ हैं | कहना   न होगा की महादेवी जी के घरेलू जीवन में दुख ही दुख था | इन्हीं दुख क्लेश और आभाओं  की काली छाया ने इनके साहित्य में करुणा , क्रंदन एवं संवेदना को भर  दिया | वही भावनाएं गद्य में भी साकार रूप से मिलती है | जहां तक विवेचनात्मक गद्य का सम्बन्ध है , वह इनके विचारपूर्ण क्षणों की देन  है यहाँ  इन्होंनें लिखा है __ " विचार के क्षणों में मुझे गद्य लिखना अधिक अच्छा लगता है | अपनी अनुभूति ही नहीं , बाहय परिस्थितियों के विश्लेषण के लिए भी पर्याप्त अवकाश रहता है | "
काव्यगत विशेषताएं ___ महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की मीरा कहा जाता है उनके काव्य में रहस्यानुभूति का रमणीय प्रतिफलन हुआ है | महादेवी के प्रणय का आलंबन अलौकिक प्रियतम है | वह सगुण होते हुए भी साकार नहीं है | वह कहती हैं _____
" मुस्कुराता संकेत भरा नभ ,
अलि क्या प्रिय आने वाले हैं ? "
      कवित्री का अज्ञात प्रियतम इतना आकर्षक है की मन उससे मिलने को आतुर हो जाता है | निम्नांकित में ललकती कामना का प्रभावशाली प्रकाशन हुआ है ___
 " तुम्हें बांध पाती सपने में |
तो चिर जीवन - प्यास बुझा
लेती उस छोटे क्षण अपने में |"
कवयित्री के स्वप्न का मूक - मिलन भी इतना मादक और मधुर था कि जागृतावस्था में भी वह रोमांचित होती रही हैं ______
" कैसे कहती हो सपना है
अलि ! उस मूक मिलन कि बात
भरे हुए अब तक फूलों में
मेरे आंसूं उनके हास | "
महादेवी वर्मा ने अपने जीवन को ' विरह का जलजात ' कहा है | ____
विरह का जलजात जीवन , विरह का जलजात |
विरह की साधना में अपने स्वयं को जलाने की बात कहती हैं ___
' मधुर - मधुर मेरे दीपक जल , 
प्रीतम का पथ आलोकित कर | '
उनके काव्य में वेदना - पीड़ा का मार्मिक चित्रण हुआ है | वे कहती हैं ___
' मैं नीर भरी दुःख की बदली | '
भाषा - शैली ____ महादेवी जी की भाषा , स्वच्छ , मधुर , संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त परिमार्जित कड़ी बोली हैं | शब्द चयन उपयुक्त तथा वाक्यविन्यास मधुर तथा सार्थक हैं | महादेवी जी का तीक्ष्ण व्यंग हृदय में व्याकुलता उत्पन्न कर देने वाला है मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग ने भाषा के सोंदर्य को और भी बड़ा दिया है | भाषा में सर्वत्र कविता की सी सरसता और तन्मयता है | महादेवी के गीत अपने विशिष्ट रचाव और संगीतात्मकता के कारन अत्यंत आकर्षक हैं | उनमें चित्रमयता और बिंबधर्मिता का चित्रण है | महादेवी जी ने नए बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से प्रगति  की अभिव्यक्ति - शक्ति का न्य विकास किया है | उनकी काव्य - भाषा प्राय तत्सम शब्दों से निर्मित है |




रविवार, 27 मार्च 2011

सुमित्रानंदन पंत

 सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तर प्रदेश के खुबसूरत आँचल के कौसानी गाँव में 20 मई  सन 1900   में  हुआ था | इनके जन्म के 6 घंटे पश्चात् ही इनके सर से माँ  का साया सदा के लिए हट गया | और इनका पालन -पोषण उनकी दादी ने ही किया | इनका नाम गुसाई दत्त रखा गया | इनकी प्रारंभिक शिक्षा - दीक्षा अल्मोड़ा में ही हुई | 1918 में वे अपने मंझले भाई के साथ काशी आ गये वहां वे क्वींस कॉलेज में पढने लगे | वहां से मेट्रिक उतीर्ण करने के बाद वे म्योर कॉलेज इलाहबाद चले गये वहां इंटर तक अध्ययन किया | उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया | 1919 में गाँधी जी के एक भाषण से प्रभावित होकर बिना परीक्षा दिए ही अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता  आन्दोलन में सक्रीय हो गये | उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से बंगाली , अंग्रेजी तथा संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया |
            प्रकृति की गोद , पर्वतीय सुरम्य वन स्थली  में जन्मे और पले होने की वजह से उन्हें प्रकृति से बेहद प्यार था | बचपन से ही वो सुन्दर रचनाएँ  लिखा करते थे | सन 1907 से 1918 के काल के स्वयं कवि ने अपने कवि जीवन का  प्रथम चरण माना है | इस काल की कवितायेँ वीणा में संकलित हैं | सन 1922 उच्छ्वास और सन 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ | सन साहित्य और रविन्द्र साहित्य का इन पर बड़ा प्रभाव था | पंत जी का प्रारंभिक काव्य इन्ही साहित्यिकों से प्रभावित था | सुमित्रानंदन पंत जी 1938 ईसवी में कालाकांकर से प्रकाशित ' रूपाभ ' नामक पत्र के संस्थापक भी रहे | सुमित्रानंदन पंत  जी की कुछ अन्य काव्य कृतिया हैं ___ ग्रंथि , गुंजन , ग्राम्या , युगांत , स्वर्ण - किरण , स्वर्ण - धूलि , कला और बुढा चाँद , लोकायतन , निदेबरा , सत्यकाम आदि | उनके जीवनकाल में उनकी 28   पुस्तकें प्रकाशित हुई | जिनमें कवितायेँ , पद्य - नाटक और निबंध शामिल हैं | सुमित्रानंदन पंत जी आकाशवाणी केंद्र प्रयाग में हिंदी विभाग के अधिकारी भी रह चुकें हैं | पंत जी जीवन भर अविवाहित ही रहे | हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है की सरस्वती का वरद पुत्र 28 दिसम्बर 1977 की मध्य रात्रि में इस मृत्युलोक को छोड़ कर स्वर्गवासी हो गये |
साहित्यिक विशेषताएं   _______ प्राकृतिक सौंदर्य  के साथ पंत जी मानव सौंदर्य  के भी कुशल चितेरे थे | छाया - वादी दौर के उनके काव्य में रोमानी दृष्टि से मानवीय सौंदर्य  का चित्रण है , तो प्रगतिवादी दौर में ग्रामीण जीवन के मानवीय सौंदर्य   का यथार्थवादी चित्रण | कल्पनाशीलता के साथ - साथ रहस्यानुभूति और मानवतावादी दृष्टि उनके काव्य की मुख्य विशेषताएं हैं | युग परिवर्तन के साथ पंत जी की काव्य चेतना बदलती रही है | पहले दौर में वे प्रकृति सौंदर्य  से अभिभूत छायावादी कवि हैं , तो दुसरे दौर में मानव सौंदर्य  की और आकर्षित और समाजवाद आदर्शों से प्रेरित कवि | तीसरे दौर  की उनकी कविताओं में नये  कविता की कुछ प्रवृतियों के दर्शन होते हैं तो अंतिम दौर में वे अरविन्द दर्शन से प्रभावित कवि के रूप में सामने आते हैं |
काव्यगत विशेषताएं __ भावपक्ष _
               प्रकृति _ प्रेम 
" छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया |
बाले ! तेरे बाल - जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन |
भूल अभी से इस जग को | "
              इन पंक्तियों से ये समझने के लिए काफी है की पन्त जी को प्रकृति से कितना प्यार था | पंत जी को प्रकृति का सुकुमार कवि  कहा जाता है | यद्यपि पंत जी की प्रकृति चित्रण अंग्रेजी कविताओं से प्रभावित है फिर भी कल्पना की ऊँची उड़ान है , गति और कोमलता है , प्रकृति का सौंदर्य  साकार हो उठता है | प्रकृति मानव के साथ मिलकर एकरूपता प्राप्त कर लेती है और कवि  कह उठता है |
' सिखा दो न हे मधुप कुमारि , मुझे भी अपने मीठे गान | '
           प्रकृति प्रेम के पश्चात् कवी ने लौकिक प्रेम  के भावात्मक जगत में प्रवेश  किया | पंत जी ने यौवन के सौंदर्य  तथा संयोग  और वियोग की अनुभूतियों की बड़ी मार्मिक व्यंजना की है | इसके पश्चात् कवी छायावाद    और रहस्यवाद की और प्रवृत हुए और कह उठे ____
" न जाने नक्षत्रों से कौन , निमंत्रण देता मुझको मौन | "
           अध्यात्मिक रचनाओं में पंत जी विचारक और कवि  दोनों ही रूपों में आते हैं | इसके पश्चात् पंत जी जन - जीवन की सामान्य भूमि पर प्रगतिवाद की और अग्रसर हुए | मानव की दुर्दशा को देखकर कवी कह उठे __
" शव को दें हम रूप - रंग आदर मानव का 
  मानव को हम कुत्सित चित्र बनाते शव का |"
+             +             +                      +
" मानव ! एसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति |
     आत्मा का अपमान और छाया  से रति | "
गांधीवाद और मार्क्सवाद से प्रभावित हो पंत जी ने काव्य  रचना की है | सामाजिक वैषम्य के प्रति विद्रोह का एक उदाहरण देखिये _
" जाती - पांति की कड़ियाँ टूटे , द्रोह , मोह , मर्सर छुटे ,
       जीवन के वन निर्झर फूटे वैभव बने पराभव | "
कला - पक्ष 
            भाषा __ पंत जी भाषा संस्कृत प्रधान , शुद्ध परिष्कृत खड़ी  बोली है | शब्द चयन उत्कृष्ट है | फारसी तथा ब्रज भाषा के कोमल शब्दों को इन्होने ग्रहण किया है | पंत जी का प्रत्येक  शब्द नादमय है , चित्रमय है | चित्र योजना और नाद संगीत की व्यंजना करने वाली कविता का एक चित्र प्रस्तुत है |
" उड़ गया , अचानक लो भूधर !
    फड़का अपर वारिद के पर !
      रव  शेष रह गये हैं निर्झर |
      है टूट पड़ा भू पर अम्बर ! "
पंत जी कविताओं में काव्य , चित्र और संगीत एक साथ मिल जाते हैं ___
      " सरकाती पट _
      खिसकती पट _
       शर्माती झट 
वह नमित दृष्टि से देख उरोजों के युग घाट ? "
बिम्ब योजना ___ बिम्ब कवि के मानस चित्रों को कहा जाता है | कवि बिम्बों के माध्यम से स्मृति को जगाकर तीव्र और संवेदना को बढाते  हैं | ये भावों को मूर्त एवं जिवंत बनाते हैं | पंत जी के काव्य  में बिम्ब योजना विस्तृत रूप से उपलब्ध होती है |
स्पर्श बिम्ब _____ इसमें कवि के शब्द प्रयोग से छुने  का सुख मिलता है __
" फैली खेतों में दूर तलक 
  मखमल सी कोमल हरियाली | "
दृश्य बिम्ब _____ इसे पढने  से एक चित्र आँखों के सामने आ जाता है ____
" मेखलाकार पर्वत अपार
  अपने सहस्त्र दृग सुमन फाड़ 
   अवलोक रहा है बार - बार 
     निचे के जल में महकार | "
शैली , रस , छंद , अलंकार ___ इनकी शैली  ' गीतात्मक मुक्त शैली  ' है | इनकी शैली अंग्रेजी व् बंगला शैलिओं  से प्रभावित है इनकी शैली में मौलिकता है वह स्वतंत्र है |
      पंत जी के काव्य में  श्रृंगार एवं करूँ रस का प्राधान्य है | श्रृगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुन्दर चित्रण हुआ है | छंद के क्षेत्र में पंत जी ने पूर्ण स्वछंदता से काम लिया है | उनकी परिवर्तन कविता  में रोला छंद  है _      
  " लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे | "
 तो मुक्त छंद भी मिलता है | ' ग्रंथि ' ' राधिका ' छंद में सजीव हो उठी है ____
" इंदु पर उस इंदु मुख पर , साथ ही | "
     पंत जी ने अनेक नवीन छंदों की उदभावना  भी की है | लय और संगीतात्मकता इन छंदों की विशेषता है |
    अलंकारों में उपमा , रूपक  , श्लेष , उत्प्रेक्षा , अतिश्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग है | अनुप्रास की शोभा तो स्थान - स्थान पर दर्शनीय है | शब्दालंकारों में भी लय को ध्यान में रखा गया है | शब्दों में संगीत  लहरी सुनाई देती है |
" लो , छन , छन , छन , छन 
       छन , छन , छन , छन 
थिरक गुजरिया हरती मन | "
          सादृश्य मूलक अलंकारों में पन्त जी को उपमा और रूपक अलंकर प्रिय थे | उन्होंने मानवीकरण और विशेषण - विपर्यय जैसे विदेशी अलंकारों का भी भरपूर प्रयोग  किया है |

गुरुवार, 24 मार्च 2011

शतरंज के खिलाड़ी

भारतीय कथा  - साहित्य के विकास में प्रेमचंद ( 1880 - 1936 ) का उल्लेखनीय योगदान  है |  प्रेमचंद का जन्म 1880 में बनारस से चार किलोमीटर दूर लमही नामक  गाँव में हुआ था | उनकी आरंभिक पढाई गाँव के एक मकतब में हुई | बनारस के मिशन स्कुल में उन्होंने मैट्रिक  पास किया | 1899   में अध्यापन से जीविकोपार्जन की शुरुवात की | नौकरी करते हुए उन्होंने बी . ए की पढाई पूरी की | वे स्कूलों के सब  - डिप्टी इंस्पेक्टर भी रहे | 1920 में महात्मा गाँधी के आहवान पर उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया | जीवन के उतर्वर्तीकाल सन 1934 में उन्होंने कुछ दिनों के लिए मुंबई में फिल्म  कथा लेखक के रूप में भी काम किया इस काम से उनका मन जल्दी ही उचट गया और वे बनारस लौट  आये |
          प्रेमचंद का मूलनाम धनपतराय था | उन्होंने लेखन की शुरुवात उर्दू से की | उर्दू में वे नवाबराय के नाम से लिखते थे | उर्दू में उनकी पहली कहानी संग्रह ' सोजे वतन ' नाम से छपा था | इसमें  रोमानी भावुकता में लिपटी  देश के लिए आत्म बलिदान  का सन्देश देने वाली पांच कहानियाँ हैं | अंग्रेज सरकार  ने राजद्रोह का आरोप लगा कर इस संग्रह को जब्त कर लिया था | प्रेमचंद जल्दी ही उर्दू से हिंदी में लिखने लगे | लेकिन उर्दू में उन्होंने लिखना बंद नहीं किया | उन्होंने अपने अधिकांश उपन्यास  पहले उर्दू में लिखे फिर उनका अपने आप ही हिंदी में रूपांतर किया | प्रेमचंद की हिंदी मुहावरेदार और बोलचाल की भाषा है | ' सेवा सदन ( 1918 ) ' बाज़ारे   हुस्न ' नाम से ' प्रेमाश्रम ' ( 1921 ) ' गोशए आफियत ' ' रंग भूमि ' ( 1925 ) ' चौगाने हस्ती ' तथा ' कर्म भूमि ' ( 1926 ) ' मैदाने अमल ' नाम से पहले उर्दू में लिखे गये थे ' लेकिन उनका प्रकाशन पहले हिंदी में हुआ था  हिंदी में प्रेम चंद  के दस पूर्ण ( तथा एक अधुरा ) उपन्यास प्रकाशित हुआ | उक्त उपन्यासों के अतिरिक्त उनके बाकि उपन्यास हैं ___ ' वरदान '  ( 1921 ) ' कायाकल्प ' ( 1926 ) ' निर्मला ' ( 1927 ) ' प्रतिज्ञा ' ( 1929 ) , ' गबन ' ( 1931 ) ' गोदान ' ( 1936 ) | मंगल सूत्र ' उनका अपूर्ण उपन्यास है | प्रेमचंद ने लगभग तीन सो कहानियां और तीन नाटक लिखे | उन्होंने तीन मासिक पत्रिकाओं ' माधुरी ', ' हंस ' और ' जागरण ' का संपादन प्रकाशन किया तथा समय - समय पर वैचारिक , साहित्यिक निबंध भी लिखे | उनके निबंधों का एक संग्रह ' कुछ विचार ' ( 1939 ) नाम से छपा | बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने और सामग्री खोजकर इसका परिवर्धित संस्करण ' साहित्य का उद्देश्य ' नाम से प्रकाशित कराया | प्रेमचंद का निधन महीनों जलोदर रोग से ग्रस्त रहने के बाद 8 अक्टूबर 1936 को बनारस में हुआ |
             प्रेमचंद सोद्देश्य साहित्य के पक्षधर थे | उनका मानना था की साहित्य को सामाजिक बदलाव में सहायक होना चाहिए तथा मानवता की बेहतरी की ओर ले जाने का दायित्व निभाना चाहिए | अपनी कृतियों के माध्यम से उन्होंने इसी महत उद्देश्य की पूर्ति भी करनी  चाही | अपने समय ओर समाज पर प्रेमचंद  की पैनी नज़र थी | वे अपने समाज की समस्याए देख  रहे थे उनके समाधान तलाशने की भी कोशिश कर रहे थे | प्रेमचंद की हर रचना में कोई न कोई समस्या उठाई गई है | शुरुवाती उपन्यासों में प्रेमचंद समस्या के साथ - साथ समाधान देने की भी कोशिश करते हैं | प्रेमचंद की रचना क्षमता निरंतर विकासशील है | शुरू में आदर्शवादी  है फिर यथर्थोंन्मुख आदर्श की ओर मुड़ते  हैं ओर अन्तः आदर्श पीछे छुट जाता है | बचता है तो सिर्फ यथार्थ | ' गोदान ' उपन्यास तथा ' कफ़न ' कहानी इसके उदाहरण हैं | दलित समस्या , स्त्री पराधीनता , किसानों की दुर्दशा प्रेमचंद के केन्द्रीय सरोकार हैं | महाजनी सभ्यता की शोषक प्रवृतियों को उजागर करने के काम को प्रेमचंद ज्यादा तवज्जो देते हैं |
शतरंज के खिलाड़ी : यह कहानी पहले पहल ' माधुरी ' पत्रिका में अक्टूबर 1924 में छपी | इस कहानी पर सत्यजित राय  ने फिल्म  भी बनाई थी | यह पतनशील सामंतवाद का जिवंत चित्र प्रस्तुत करने वाली रचना है | वक्त वाजिद अलीशाह ( शाषनकाल  1847 -1856 ) का है | लखनऊ में लोग विलासता में डूबे हैं |समाज का उपरी तबका घोर आत्मकेंद्रित है | देश और  दुनिया में क्या हो रहा है इसके प्रति वे लोग बेखबर है | मिर्ज़ा सज्जाद अली ओर मीर रोशन अली के जरीय प्रभुवर्ग की दिग्भ्रमित  मानसिकता  का चित्रण किया  है  लखनऊ पर अंग्रेजी सेना का कब्ज़ा हो गया | वाजिद अलीशाह बंदी बना लिए गये | मीर ओर मिर्जा इससे  परेशान नहीं होते | वे शतरंज खेलते हुए अपनी जान दे देते हैं |