1829 में वे दिल्ली लौटे जहां उन्होंने बाकि जिन्दगी गुजारी | दिल्ली में उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा | अधिकरियों से उनका बराबर का झगडा चलता रहा | इन सब मुश्किलों के बावजूद उन्होंने लगातार सृजन किया | अपने तमाम दोस्तों को लिखे खतों में उन्होंने बताया है की लिखना उनके लिए सुकून का स्त्रोत है | ग़ालिब ने यह सोचकर खुद को सांत्वना दी की एक कवि की महानता का मतलब ही है ... अंतहीन दुर्भाग्य | आर्थिक तंगी से ही शायद उनमें जुए का शौक पैदा हुआ होगा जिसकी वजह से उन पर मुकदमा चला वे 1847 में जेल में डाले गए | यह घटना उनकी जिन्दगी की सबसे हताशा - जनक अनुभवों में से एक है | यह वर्ष ग़ालिब के लिए मिश्रित वरदान साबित हुआ कयुकि इस समय वे मुग़ल दरबार के संपर्क में आए जो एक दशक तक चला | इस दौरान उन्होंने मुहब्बत और जिंदगी के मसायल पर जम कर लिखा | ग़ालिब के दो समकालीनों ने उनकी जीवनियाँ लिखी | ये हैं हाली द्वारा रचित ' यादगारे- ए - ग़ालिब ' ( 1897 ) और मिर्जा मोज द्वारा ' हयात - ए - ग़ालिब ' ( 1899 ) | ये जीवनियाँ हमें उनकी जिंदगी और वक़्त को समझने की अंतदृष्टि देती है |
ग़ालिब ने उर्दू और फारसी दोनों ही भाषाओँ में लिखा है | 19 वी शताब्दी में उर्दू और फारसी की कविता और ग़ज़ल का वर्चस्व था | मोमिन , जोक और ग़ालिब इसके सरताज थे | शायरी की दुनिया आशिक ( प्रेमी ) माशूक ( प्रेमिका ), रकीब ( प्रेमी का प्रतिद्वंदी ) साकी ( प्याला देने वाला ) और शेख ( धर्म गुरु ) के इर्द - गिर्द घुमती थी | ग़ालिब की लगभग सभी उर्दू कविताएँ ग़ज़ल शैली में हैं जिनका कथ्य प्राय : परम्परा से तय होता था | लेकिन , इनके लचीलेपन में इहलौकिक और अलौकिक दोनों तत्वों का सहजता से समावेश हो जाता था | खुदा के प्रति और माशूका के प्रति प्रेम मुख्य विषय - वस्तु थे तो गजल की शैली इसके लिए वो ज़मीन उपलब्ध करवा देती थी जिस पर कवि शत्रुवत और उदासीन समाज के विरुद्ध प्रेम और गूढ़ मानववाद के आदर्शों को उकेर ( उभारना ) सकता था | ग़ालिब के उर्दू दीवान का पहला संस्करण 1841 में प्रकाशित हुआ | मयखाना - ए - आरजू ' शीर्षक के अंतर्गत फारसी लेखक का संग्रह 1895 में प्रकाशित हुआ | उनकी फारसी डायरी ' दस्तम्बू ' ( 1858 ) सिपाही विद्रोह और दिल्ली पर इसके प्रभाव का प्रमाणिक दस्तावेज है | 1868 में कुल्लियत - ए - नत्र - ए - फारसी - ए ग़ालिब ' नाम से उनका फारसी लेखन का एक और संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमे पत्र , प्राक्कथन , टिप्पणियाँ आदि थे | एक गद्द्य लेखक के रूप में उनकी ख्यति उनके पत्रों के कारण है , जो ' उद् - ए - हिंदी ' ( 1868 ) और ' उर्दू - ए - मुअल्ला ' ( 1869 ) नाम के दो संकलनों में प्रकाशित है |
हजारों ख्वाहिशें एसी : यह एक एसी गजल है जो मानवीय अस्तित्व की दुविधाओं , एक मनुष्य के आकांक्षाजन्य तनावों और एक जीवन आदर्श की तलाश में लगे कवि की भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है | यह ग़ज़ल शेरों की एक श्रृंखला से बुनी गई है जिसमें प्रत्येक शेर स्वतंत्र अर्थ देता है और विषय और भाव की दृष्टि से अपने आप में पूर्ण है | शुरुवाती शेर ( मतला ) छंद योजना ( काफिया ) और स्थाई टेक ( रदीफ़ ) का संकेत देता है | अंतिम शेर में शायर अपना तखल्लुम शामिल करता है | इस ग़ज़ल में मानव जीवन की अत्यधिक गहन और अत्यधिक उथली दोनों ही प्रकार की चेष्टाएँ परस्पर गुंथी हुई दिखाई देती है | इसी तरह विलास और विषाद दोनों ही स्वर साथ - साथ चलते हैं |
कवि जब प्रेम की खोज में , जो लौकिक भी है और परलौकिक भी , और इस प्रेम को अभिव्यक्त करने की भाषा की खोज में जैसे - जैसे आगे बढता है तब ए परस्पर विरोधी भाव और भंगिमाएं उजागर होने लगती है |
कवि जब प्रेम की खोज में , जो लौकिक भी है और परलौकिक भी , और इस प्रेम को अभिव्यक्त करने की भाषा की खोज में जैसे - जैसे आगे बढता है तब ए परस्पर विरोधी भाव और भंगिमाएं उजागर होने लगती है |
हजारों ख्वाहिशें एसी , कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान , लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यों मेरा कातिल , क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूं जो चश्मे - तर - से1 उम्र - भर यूँ दम - ब - दम2 निकले
निकलना खुल्द3 से आदम सुनते आये थे लेकिन
बहुत बेआबरू होकर तेरे कुचे से हम निकले
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर4 पे दम निकले
कहाँ मखाने का दरवाजा ' ग़ालिब ' और कहाँ व़ाईज़5
पर इतना जानते हैं , कल वो जाता था की हम निकले
______________________
चश्मे - तर - से ::::::::: भीगी आँख से
दम - ब - दम :::::::::::: क्षण - क्षण
खुल्द :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: स्वर्ग
काफ़िर :::::::::::::::::::::::::::::::::::: नास्तिक
व़ाईज़ ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: धर्मोपदेशक
____________________________________________
डरे क्यों मेरा कातिल , क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूं जो चश्मे - तर - से1 उम्र - भर यूँ दम - ब - दम2 निकले
निकलना खुल्द3 से आदम सुनते आये थे लेकिन
बहुत बेआबरू होकर तेरे कुचे से हम निकले
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर4 पे दम निकले
कहाँ मखाने का दरवाजा ' ग़ालिब ' और कहाँ व़ाईज़5
पर इतना जानते हैं , कल वो जाता था की हम निकले
______________________
दम - ब - दम :::::::::::: क्षण - क्षण
खुल्द :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: स्वर्ग
काफ़िर :::::::::::::::::::::::::::::::::::: नास्तिक
व़ाईज़ ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: धर्मोपदेशक
____________________________________________