एक नज़र इधर भी
गुरुवार, 30 सितंबर 2010
दास्ताँ
हमारी दास्ताँ पूरी सुनना ये दोस्त लेकिन ,
वहां से रुख बदल देना जहां माथे पे बल आये !
मन की बात
दुनिया की नजरो
मै आये !
कितने भेद हमारे
मन के !
तुम भी चुप और
मै भी चुप !
खोले कोन किवारे
मन के !
दाग
जलता हुआ दिया बुझ जाता है ,
चिराग फिर भी रह जाता है !
मोहबत ख़तम हो जाती है लेकिन ,
दिल पे दाग फिर भी रह जाता है !
इंतजार
हर जगह बैठने का मतलब इंतजार नहीं होता ,
हर किसी से मिलने का मतलब इकरार नहीं होता ,
यु तो नज़रे हजारो से मिलती है मगर ,
हर नज़र का मतलब प्यार नहीं होता !
जिद
कोई केफियत --------ही ----------- नहीं !
की अपने को अपनी जिद जो बना ना दे !
की वो गम ही क्या जो हंसा न दे !
वो ख़ुशी भी क्या जो रुला ना दे !
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
धरम
बहस से बड़ी कोई बहस नहीं है ,
धरम से बड़ी कुच्छ की जागीर नहीं है !
ये दुनिया वालो की बनाई हुई हस्ती है ,
इस पर कोई बहस मुमकिन ही नहीं है !
क्युकी,धरम से बड़ी कोई ज़ंजीर नहीं है !
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