बुधवार, 9 मार्च 2011

लिओ टालस्टॉय

    
Everyone thinks of changing  the world
but no one thinks of changing himself ...
                                               टालस्टॉय की वोल्कोंस्की परिवार की थी | वे दहेज़ में अपने साथ ' यासनाया पोल्याना ' रियासत भी लाई थी , जिसमें तीन सौ कृषि दास थे | टालस्टॉय को जुआ खेलने से कोई परहेज़  नहीं था | एक बार जुआ खेलते हुए वो कुछ इतना हार गये कि उन्हें अपनी रियासत का कुछ भाग बेचना भी पड़ा | अपनी मानसिक शक्तियों पर मुग्ध लिओ को यह गुमान था कि उनका चिंतन शुद्ध अध्यात्मिक  है |
              विश्व प्रसिद्ध उपन्यासकार ' युद्ध और शांति जैसी ' अप्रतिम कृति  के लेखक और महान समाज सुधारक लिओ टालस्टॉय खुद  को ईश्वर का बड़ा  भाई मानते थे | उनका जन्म 1872 में रूस में संभ्रांत परिवार में हुआ था | उन्हें हमेशा यही लगता था कि उनकी अध्यात्मिक शक्ति , अतुलनीय व् अव्याख्यायित है | यहाँ वे अपने को बुद्ध , सुकरात , पास्कल कन्फुशियस एवं स्पिनोजा से बेहतर मानते थे | ईश , केन , कठ आदि उपनिषद अपने सिरहाने रखकर सोने वाला जर्मन दार्शनिक शापेन्हावर उन्हें हमेशा प्रेरित करता था कि जो कुछ लिखें  वो अकाट्य हो | उनकी डायरी पढने  पर लगता है कि कार्ल मार्क्स कि तरह उन्होंने भी अपना लेखकीय जीवन काव्य रचना से ही शुरू किया था | डायरी में ये भी लिखा मिलता है _ ' मुझे आज तक एसा आदमी नहीं मिला , जो नैतिक  स्तर पर ठीक मेरे जैसा हो | ' उन्हें आश्चर्य होता है कि लोग उनके गुणों को पहचानते क्यु नहीं , मुझे प्यार क्यु नहीं करते ? मैं इतना बुरा नहीं , मेरा अंगभंग भी नहीं हुआ फिर भी लोगों को मेरे प्रति आसक्ति क्यु नहीं ?
            वे हरेक व्यक्ति के साथ और हर स्थिति में एक तरह कि  निर्णयात्मक मुद्रा अपनाये रखते थे , जैसे उन्होंने नैतिकता का ठेका ले रखा हो | जब वे एक महान उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हो गये तो ईश्वर जैसी शक्ति का प्रदर्शन करने लगे | टालस्टॉय ने लिखा है _ ' जब लेखन के क्षणों में मुझे किसी पात्र पर दया आ जाती है तो मैं जान -बुझकर उसके ओछेपन में कुछ बेहतर गुण भर देता हूँ अथवा उसके समांतर खड़े किसी पात्र के कुछ गुण घटा देता हूँ | टालस्टॉय जब समाज सुधारक के रूप में प्रसिद्ध हो गये तब ईश्वर के तदरूप हो गये और उनकी भ्रम - भंगिमा उनमें  और अधिक विकसित हो गई | वे तरह - तरह  से अपनी दिव्यता का प्रदर्शन करने लगे | उन्होंने लिखा भी है _ ' ओ पिता ! वर दो रक्षा करो कि मुझमें तुम्हारा आवास बना रहे | ' मगर ईश्वर कि मुश्किल यह थी कि लिओ संशयवादी भी थे | एसी स्थिति में गोर्की ने लिखा है _ ' एक गुफा में दो रीछ कैसे रह सकते थे | ' अल्लाह मियां का बड़ा भाई होने का भ्रम लिओ को क्यु था ? कारण शायद  ये हो सकता है कि उनका जन्म एक जागीरदार परिवार में हुआ था |
              उन दिनों कृषि - दास प्रथा जोरों पर थी | टालस्टॉय की वोल्कोंस्की परिवार की थी | वे दहेज़ में अपने साथ ' यासनाया पोल्याना ' रियासत भी लाई थी , जिसमें तीन सौ कृषि दास थे | टालस्टॉय को जुआ खेलने से कोई परहेज़  नहीं था | एक बार जुआ खेलते हुए वो कुछ इतना हार गये कि उन्हें अपनी रियासत का कुछ भाग बेचना भी पड़ा | अपनी मानसिक शक्तियों पर मुग्ध लिओ को यह गुमान था कि उनका चिंतन  शुद्ध अध्यात्मिक है | टालस्टॉय अपने समकालीन लेखकों के प्रति वितृष्णा का भाव रखते थे और अपनी अनुवांशिकता के कारण ' महत्व - बोध से पीड़ित थे | तुर्गनेव उनकी इस दोगली आत्म - विभोर स्थिति से परिचित था , क्युकी वह उनकी उद्दाम काम भावना से अदभुत रति लीलाओं के बारे में जानता था | ये उनकी डायरी में भी लिखा मिलता है _ ' मस्ट हेव ए वूमेन ' | सेक्सुअली गिव्स मी नाट ए मोमेंट्स पीस | ' ( डायरी 4 मई  1853 ) | लिओ के अनुसार ' वेश्यागामी होने के कारण उन्हें सुज़ाक रोग भी हुआ | ' उनकी जीवनी लिखने वाले एलमरमाड ने लिखा है _ ' इक्यासी वर्ष कि आयु तक कामवासना ने टालस्टॉय का पीछा नहीं छोड़ा |'
           'अन्ना कैरनीना ' , ' वार एंड पीस ' और ' रीफरेक्शन ' लिओ टालस्टॉय कि महान कृतियाँ हैं | मगर ' वार एंड पीस ' के बारे में उपन्यासकार फ्लाबेयर ने तुर्गनेव से यह शिकायत कि थी कि ' लिओ ने इतिहास विषय पर जो व्याख्यान पहले कभी दिए थे , उन्हें भी इस उपन्यास में शामिल  कर लिया गया है | ' इसके आलावा टालस्टॉय ने ' मिलिट्री गेजेट ' भी लिखा है , शायद  इसलिए कि कुछ समय तक वे सेना में भी रहे थे और एक भालू को मारने कि कोशिश में घायल भी हुए थे |
            महत्वबोध से पीड़ित टालस्टॉय के माता - पिता बचपन में ही नहीं रहे थे | उनका लालन -पालन उनकी चाची तालियाना ने किया था | 16 वर्ष कि आयु में उन्होंने कज़ान विश्वविध्यालय के भाषा - विभाग में दाखिला लिया | फिर वो कानून पढने  लगे | 22 वर्ष  कि आयु में वो काकेशस गए और सेना में भर्ती हुए | तीन बार उन्हें बहादुरी का मेडल मिलते -मिलते रह गया |
             1858 में उन्होंने लिखा _ मैं कुछ एसा सूत कातना चाहता हूँ , जिसका कोई सर पैर न हो | ' उनके पुत्र इल्या  ने लिखा है _ पिता श्री के लिए दुनिया दो भागों में विभक्त थी | एक और उनका परिवार , दूसरी और शेष संसार | उन्होंने हमें यही सिखाया  था | इस मिथ्याभिमानी को तोड़ने में मुझे भीतर ही भीतर लंबा संघर्ष करना पड़ा | ' गोर्की ने लिखा है _ टालस्टॉय बुड़ापे तक इसी झूठी अहम् मान्यता का शिकार रहे कि दुसरे लोग उनकी इच्छानुसार  चलें और बर्ताव करें |

गुरुवार, 3 मार्च 2011

मुझसे पहली- सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग

 फैज़ ( 1911 - 1984 ) का जन्म पंजाब के सियाल कोट में हुआ था | उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की उपाधि ली और अमृतसर में कार्य  शुरू किया | वहां वे माकर्सवाद के संपर्क में आये और प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हुए | द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अध्यापन कार्य छोड़ कर वे भारतीय सेना में शामिल हुए और उन्हें अपनी उत्कृष्ट सेवा के लिए एम . बी . ई पुरुस्कार प्राप्त हुआ | भारत विभाजन के बाद उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी और लाहौर  चले गए | यहाँ वे संपादन कार्य के साथ - साथ ट्रेड यूनियन नेता के रूप में कार्य करते रहे | 1951 में सरकार विरोधी गतिविधियों में भाग लेने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया  गया और उन्हें चार वर्ष की सजा भी मिली | 1962 में उन्हें लेनिन शांति  पुरस्कार से भी नवाज़ा गया | उसके बाद दो साल उन्होंने लन्दन में बिताये | इस दौरान  इन्होनें  खूब भ्रमण किया | उसके बाद वे लाहौर  वापस आये , परन्तु वो यहाँ शांति से नहीं रह सके | उन्हें लाहौर छोडना  पड़ा और 1978 से लेकर 1982 तक वो बेरुत में आत्मनिर्वासन की स्थिति में रहे | वे फिर लाहौर लौटे  और 1984 में लाहौर में ही उनका निधन हो गया |
             ' नक्श - ए - फरियादी ' ( 1941 ) ' दस्त - ए - सबा ' ( 1953 ) ' जिंदानामा ' ( 1956 ) ' सर - ए - वादिए - सिना ' ( 1971 ) और शाम - ए - सहर - यारां  ( 1979 ) में लिखी गई हैं | इनकी कविताओं का अनेक भाषाओँ में अनुवाद हुआ और ये कवितायेँ पत्र - पत्रिकाओं और रेडिओ आदि के माध्यम से पाठकों और दर्शकों की बहुत बड़ी संख्यां तक पहुंची | लगभग हर लोकप्रिय गायक ने उनकी गजलों को गाया है |
               फैज़ को जितना क्रान्तिकारी  कवि माना जाता है उतना ही बड़ा प्रेम का कवि भी माना जाता है | उनके लिए क्रांतिकारिता और प्रेम की अभिव्यक्ति दो अलग - अलग भाव न होकर , एक समग्र अभिव्यक्ति के ही रूप थे | फैज़ की कविता में प्रेम के अनेक रूप है | प्रेम का आशय चुनौती , अवज्ञा , आत्म अभिव्यक्ति अथवा आत्म निषेध , आत्म त्याग , आत्म दया , वियोग और निष्कासन की पीड़ा ( जिससे फैज़ अच्छी तरह से परिचित थे ) __ इनमें से कुछ भी हो सकता है | ' मुझसे पहली- सी  मुहब्बत मेरी महबूब  न मांग ' उनकी पहली नज्मों में से एक है | इसमें जीवन की कठोर वास्तविकताओं का वह अनुभव है जो उन्हें उनकी प्रेमिका और उनके प्रेम से अलग हटने को विवश करता है  |
              फैज़ हफ़ीज़ और रूमी के सूफी आदर्शों से प्रभावित हैं | पुरानी परम्पराएँ और मुहावरे उनकी कविता में  उस समय तात्कालिक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं , जब कवि को यह  एहसास होता है की प्रेम की उनकी प्रारम्भिक चाह और वर्तमान में सामाजिक और राजनैतिक न्याय की तलाश वस्तुत : दोनों ही स्थिति के दो रूप हैं | दोनों ही त्याग और सम्पूर्ण की मांग करते हैं |
              यह नज़्म वर्तमान विसंगतियों और समस्याओं को एक एसे मुहावरे में जो प्राच्य स्वर को बनाये रखने के साथ ही तथा ग़ालिब और इकबाल जैसे कवियों द्वारा प्रयुक्त पारम्परिक प्रतीकों शब्दों और छवियों को एक नई चेतना के साथ अभिव्यक्त करने की उनकी क्षमता को प्रदर्शित करती है | अपने एक साक्षात्कार में फैज़ ने बताया कि उनके लिए " पुराना और नया , पारम्परिक और समकालीन साहित्य कि व्यापक और मिली - जुली रवायत में उचित स्थान ग्रहण करते हैं | " फैज़ जीवन भर उर्दू , पंजाबी , हिंदी , फारसी और अंग्रेजी तथा अन्य  भाषाओँ के साहित्य कि विभिन्न परम्पराओं के गहन अध्येता रहे | इन सबकी समन्वय उनकी काव्य यात्रा में अनूठे ढंग से दिखाई देता है |

मुझसे पहली मुहब्बत मेरी महबूब न मांग 
मैनें समझा कि तू तो दरख्शां१ है हयात २ 
तेरा गम है तो गमें - दहर३ का झगडा क्या है 
तेरी सूरत से है आलम४ में बहारों को सबात५ 
तेरी आँखों के सिवा दुनियां में रखा क्या हैं ?
       तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं६  हो जाये 
यूँ न था , मैने फकत चाहा था यूँ हो जाये 
और भी दुःख है जमाने में मुहब्बत के सिवा 
राहतें और भी हैं वस्ल कि राहत७ के सिवा 
अनगिनत सदियों के तारिक ८ बहीमाना९  तिलिस्म 
रेशमो - अतलसो - कम ख्वाब१० में बुनवाये हुए 
जा - ब - जा११ बिकते कूचा१२ - ओ - बाज़ार में जिस्म 
खाक१३  में लिथड़े हुए खून में नहलाये हुए 
        लौट  जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे 
       अब भी दिलकश१४ है तेरा हुस्न , मगर क्या कीजे 
और भी दुख है जमाने में मुहोब्बत के सिवा 
राहतें और भी है वस्ल कि राहत के सिवा 
मुझसे पहली से मुहब्बत मेरे महबूब न मांग |

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१   दरख्शां ------------------रौशन , चमकता हुआ |
२   हयात --------------------जीवन 
३    गमें दहर ------------------जमाने का दुःख 
४    आलम ----------------------दुनियां 
५    सबात ----------------------ठहराव 
६    निगूं -------------------------बदल जाना 
७    वस्ल कि राहत ---------------मिलन का आनंद 
८     तारिक ----------------------अँधेरा 
९     बहीमाना --------------------पशुवत , क्रूरता 
१०   रेशमो - अतलसो - कम ख्वाब------ रेशम , अलतस और मलमल , कपड़ों के प्रकार 
११   जा - ब - जा ------------------जगह - जगह 
१२   कूचा --------------------------गली 
१३    खाक -------------------------धुल , राख
१४   दिलकश -----------------------आकर्षण 
         --------------------------------------------------  

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

संतों देखत जग बौरान

उत्तर भारत में निर्गुण संत परम्परा की जो धरा प्रवाहित हुई उसका श्रेय कबीर को दिया जाता है | वैसे तो कबीर का जीवन किम्वदंतियों , अटकलों , चमत्कारिक कहानियों से ढक दिया गया है |
जो बात असंदिग्ध रूप से कही जा सकती है वह ये है की उनका पालन - पोषण एक जुलाहा परिवार में हुआ था | इस परिवार को इस्लाम धर्म में आये हुए अभी बहुत समय नहीं हुआ था , इसलिए इस्लाम और हिन्दू दोनों धार्मिक परम्पराएँ साथ - साथ चल रही थी | कबीर के गुरु के रूप में रामानंद का नाम लिया जाता है | इस बिंदु पर विद्वानों का मत भले एक न हो लेकिन निर्गुण राम के प्रति कबीर की निष्ठां संदेह से परे है | आजीविका के लिए कबीर जुलाहे का व्यवसाय करते थे | कबीर के जीवन काल के सम्बन्ध में अध्येताओं में मतभेद है | मोटे तोर में उनका समय सन 1398 - 1448 माना गया है | 
                   कबीर की काव्य - संवेदना लोकजीवन से अपनी उर्जा ग्रहण करती है | यह संवेदना मनुष्य - मात्र की समानता की पक्षधर है | जो परम्परा  मनुष्य मनुष्य में भेद करती है , कबीर उसके खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं | वे शास्त्र ज्ञान पर नहीं ,' आखिन देखि ' पर यकीं करते हैं | ढोंग और पाखंड से उन्हें गहरी चिढ है | वे सहज , सरल जीवन जीने के पक्ष में हैं | प्रवृति और निवृति दोनों तरह का अतिवाद उन्हें कभी स्वीकार  नहीं हुआ | उनकी कविता में एक जुलाहे का जीवन बोलता है | वे पुरे आत्मविश्वास के साथ प्रतिपक्षी को चुनौती देते हैं | उनकी कविता जीवन के बुनियादी सवाल उठाती है | इन सवालों की प्रासंगिकता छ: सौ साल बाद आज भी बनी हुई है |
         कबीर को ' वाणी का डिक्टेटर ' कहा गया है | इस का अर्थ ये है की भाषा उनकी अभिव्यक्ति में रोड़े नहीं अटका पाती | वे बोलचाल की भाषा के हिमायती थे | उनकी कविता में तमाम बोलियों , भाषाओँ से आये शब्द शामिल हैं | कबीर की रचनाओं की प्रमाणिकता को लेकर विवाद है | कबीर की रचनाएँ प्राय : मौखिक रूप से संरक्षित रही , इसलिए उनमे भाषा के बदलते रूपों की रंगत शामिल होती गई | इन रचनाओं का मूल रूप क्या था , इसका ठीक - ठीक पता लगाना आज बहुत कठिन है | कबीर की वाणियों का संग्रह ' बीजक ' के नाम से प्रसिद्ध है | कबीरपंथ इसे ही प्रमाणिक मानते हैं | कबीर की रचनाओं का संग्रह और संपादन आधुनिक युग के कई विद्वानों ने किया है |
           कबीर को हिन्दू - मुस्लिम एकता का प्रतीक बना दिया गया है | एसी समझ प्रचारित कर दी गई है की कबीर दोनों धर्मों को आपस में जोड़ने की कोशिश कर रहे थे | जहां भी ' सर्व - धर्म - समभाव ' की बात आती है वहां कबीर को उदाहरण के रूप में रखा जाता है | यह मान्यता पूरी तरह सही भी नहीं है | कबीर मात्र सर्व - धर्म - समभाव के कवी नहीं हैं | वे अपने समय में मौजूद सभी धर्मों की बुराइयों से परिचित हैं | उनकी आलोचना करने  में वे हिचकते नहीं | उनका व्यंग , धर्म का धंधा करने वालों की पोल खोल देता है | हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों में उन्हें मिथ्यात्व दिखाई देता है | वे इन संगठित धर्म - मतों से अलग तीसरे विकल्प का प्रस्ताव करते हैं | समाज की गति पर कबीर को गुस्सा  आता है | उनका गुस्सा इस बात को लेकर है की यह संसार झूठ पर तो विश्वास कर लेता है लेकिन सच बताने वालों को मारने दौड़ता है |

संतों देखत जग बौरान |
सांच कहों तो मरण धावै | झूठे जग पतियाना ||
नेमी देखा धरमी देखा |परत करे असनाना ||
आतम मरी पखान्ही पूजै |उनमें कछु नहीं ज्ञाना ||
भुतक देखा पीर औलिया | पढ़े किताब कुराना ||
कहे कबीर सुनो हो संतों | ई सब गर्भ भुलाना ||
केतिक कहों कहा नहिं मानै | सहजै सहज समाना ||

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम का जन्म गुजरांवाला में सन 1919 में हुआ | उन्होंने छोटी  सी उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया | उनकी कविताओं की दो शुरुवाती संग्रह ' ठंडिया किरणां ' (1935 ) में और 'अमरित लहरा ' ( 1930 ) पारम्परिक अभिप्रायों और विषयों से सजी भावनात्मक पूर्ण उपदेशों को दर्शाती है | मार्क्सवादी विचार और प्रगतिशील लेखक आन्दोलन के सम्पर्क में आने के बाद ही उन्होंने सामाजिक और राजनैतिक  कवितायेँ लिखनी शुरू की | इस समय की इनकी महत्वपूर्ण  रचनाओं में से ' पत्थर गिते ' एक है जो  ( 1940 ) में लिखी गई थी जिसमें विरोध और आत्म दया जैसी काव्य मुद्राएँ मिली है | 1940   में देश विभाजन के समय वे नई  दिल्ली आ गई थीं | यहाँ आकर उन्होंने अपनी मातृभाषा छोड़ कर हिंदी में लिखना शुरू किया |देश के विभाजन और उसके परिणाम स्वरूप बहुत  बड़ी मात्रा में औरतों  की बेइज़्ज़ति, अपमान और बलात्कार ने उनकी  लेखनी में बहुत ज्यादा असर डाला | उनकी रचना ' पिंजर ' ( 1970 ) में आई जिसमें इस वक़्त का बहुत ही मार्मिक लेखा - जोखा देखने  को मिलता है | जिसमें धार्मिक और राजनितिक संघर्ष उनके अपने नारीत्व के नज़रिए से देखने को मिलते हैं | अमृता प्रीतम को ( 1956 ) में साहित्य अकादमी पुरुस्कार मिला था उस वक्त वो पहली महिला थी जिन्हें इस पुरुस्कार से नवाज़ा गया था | यह परुस्कार उनकी रचना ' सुनहरे ' को मिला था | इस रचना में उन्होंने अपने भाग्य और सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ एक नारी की चीख का चित्रण किया था | उनकी कहानी और कविताएँ निजी जिंदगी के संस्पर्श से युक्त है कंयुकी   इनमें अमृता प्रीतम दुखद विवाह , दमित प्रेम और साथ ही सखाभाव की मुक्तिकारी शक्ति को चित्रित करती है | ' कागज ते कैनवास ' ( 1973 ) पर 1982 में मिले भारत के साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ के साथ अमृता प्रीतम को बहुत सारे राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं | अमृता प्रीतम ने बहुत बड़े पैमाने में लेखन  किया है | 1976 में छपी अपनी आत्मकथा  ' रसीदी टिकट ' के अतिरिक्त उन्होंने 28 उपन्यास , 18 खंडो में कवितायेँ  , पांच कहानी संग्रह और अलग -अलग विषयों में 16  संकलनों में गद्य लेखन भी किया है | अपने जीवन और रचना कर्म में अमृता प्रीतम एक स्त्री , एक व्यक्ति और एक रचनाकार के तौर पर स्वतंत्रता के अपने अधिकार के प्रति निष्ठावान और मुखर रही हैं | अपने गैर पारम्परिक , निजी और पेशेवर चुनाओं और निडरता ने उन्हें भारतीय साहित्य जगत का प्रेम पात्र और अपराधी दोनों बना दिया |

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

असदुल्ला खान मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़ालिब ( 1797  - 1869  ) उन तुर्कों के संभ्रांत परिवार में से थे , जो ट्रांसोक्सियाना से चलकर 18 वीं शताब्दी में भारत आये थे | उस समय दिल्ली की गद्दी पर शाह आलम द्वितीय  आसीन था ग़ालिब  का जन्म आगरा में हुआ था और वो युवावस्था में दिल्ली आ गये थे | उनका बचपन पतंगबाज़ी और शतरंज खेलते हुए ख़ुशी - ख़ुशी बीता | उन्होंने अपना अधिकांश जीवन दिल्ली में ही गुजारा | 1827  में वो कलकत्ता  गये वहां दो वर्ष बहुत प्रसन्नता - पूर्वक रहे | कलकत्ता  की हरियाली  , खुबसूरत औरत  और आमों ने उन्हें खूब लुभाया , साथ ही यहाँ रहते हुए उन्हें मुस्लिम , बंगाली और अंग्रेज बुद्धिजीवियों से सम्पर्क का अवसर मिला | वे अख़बार और आधुनिक विचारों से अवगत हुए जिसने उनकी जीवन दृष्टि और शायरी को समृद्ध किया |
                          1829 में वे दिल्ली लौटे  जहां उन्होंने बाकि जिन्दगी गुजारी | दिल्ली में उन्हें  आर्थिक   कठिनाइयों का सामना करना पड़ा | अधिकरियों से उनका बराबर का झगडा चलता रहा | इन सब मुश्किलों के बावजूद उन्होंने लगातार सृजन किया | अपने तमाम दोस्तों को लिखे खतों में उन्होंने  बताया  है की लिखना उनके लिए सुकून का स्त्रोत  है | ग़ालिब ने यह सोचकर खुद को सांत्वना दी की एक कवि  की महानता का मतलब ही है ... अंतहीन दुर्भाग्य | आर्थिक तंगी से ही शायद उनमें  जुए  का शौक  पैदा हुआ होगा जिसकी वजह से उन पर मुकदमा चला वे 1847  में जेल में डाले गए | यह घटना उनकी जिन्दगी की सबसे हताशा - जनक अनुभवों में से एक है | यह वर्ष ग़ालिब के लिए मिश्रित वरदान साबित हुआ कयुकि  इस समय वे मुग़ल दरबार के संपर्क में आए जो एक दशक तक चला | इस दौरान   उन्होंने  मुहब्बत और जिंदगी के मसायल पर जम कर लिखा | ग़ालिब के दो समकालीनों ने उनकी जीवनियाँ लिखी | ये हैं हाली द्वारा रचित ' यादगारे- ए - ग़ालिब ' ( 1897  ) और मिर्जा मोज द्वारा ' हयात - ए -  ग़ालिब '  ( 1899  ) | ये जीवनियाँ हमें  उनकी जिंदगी और वक़्त को समझने की अंतदृष्टि देती है |
                          ग़ालिब ने उर्दू और फारसी दोनों ही भाषाओँ में लिखा है | 19  वी शताब्दी में उर्दू और फारसी की कविता और ग़ज़ल का वर्चस्व था | मोमिन , जोक और ग़ालिब इसके सरताज थे | शायरी की दुनिया आशिक ( प्रेमी ) माशूक ( प्रेमिका ), रकीब ( प्रेमी का प्रतिद्वंदी ) साकी ( प्याला देने वाला ) और शेख ( धर्म गुरु ) के इर्द - गिर्द घुमती थी | ग़ालिब की लगभग सभी उर्दू कविताएँ ग़ज़ल शैली  में हैं जिनका कथ्य प्राय : परम्परा से तय होता था | लेकिन , इनके लचीलेपन में इहलौकिक और अलौकिक दोनों तत्वों का सहजता से समावेश हो जाता था | खुदा के प्रति और माशूका के प्रति प्रेम  मुख्य  विषय - वस्तु थे तो गजल की शैली  इसके लिए वो ज़मीन उपलब्ध करवा देती थी जिस पर कवि  शत्रुवत और उदासीन  समाज के विरुद्ध प्रेम और गूढ़ मानववाद के आदर्शों को उकेर ( उभारना  ) सकता था | ग़ालिब के उर्दू   दीवान का पहला संस्करण  1841  में प्रकाशित हुआ | मयखाना - ए - आरजू ' शीर्षक के अंतर्गत फारसी लेखक का संग्रह 1895  में प्रकाशित हुआ | उनकी फारसी डायरी ' दस्तम्बू ' ( 1858  ) सिपाही विद्रोह और दिल्ली पर इसके प्रभाव का प्रमाणिक दस्तावेज है | 1868 में कुल्लियत - ए - नत्र - ए - फारसी - ए  ग़ालिब ' नाम से उनका फारसी लेखन का एक और संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमे पत्र , प्राक्कथन , टिप्पणियाँ आदि थे | एक गद्द्य लेखक के रूप में उनकी ख्यति उनके पत्रों के कारण  है , जो ' उद् - ए - हिंदी ' ( 1868  ) और ' उर्दू - ए - मुअल्ला ' ( 1869  )  नाम के दो संकलनों में प्रकाशित है |
                   हजारों  ख्वाहिशें  एसी : यह एक एसी गजल है जो मानवीय अस्तित्व की दुविधाओं , एक मनुष्य के आकांक्षाजन्य तनावों   और एक जीवन आदर्श की तलाश में लगे कवि की भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है | यह ग़ज़ल शेरों  की एक श्रृंखला से बुनी गई है जिसमें प्रत्येक शेर स्वतंत्र अर्थ देता है और विषय और भाव की दृष्टि से अपने आप में पूर्ण है | शुरुवाती शेर ( मतला ) छंद योजना ( काफिया ) और स्थाई टेक ( रदीफ़ ) का संकेत देता है | अंतिम शेर में शायर अपना तखल्लुम शामिल  करता है | इस ग़ज़ल में मानव जीवन की अत्यधिक गहन और अत्यधिक उथली दोनों ही प्रकार की चेष्टाएँ परस्पर गुंथी  हुई दिखाई देती है | इसी तरह विलास और विषाद दोनों ही स्वर साथ - साथ चलते हैं |
                  कवि जब प्रेम की खोज में , जो लौकिक भी है और परलौकिक भी , और इस प्रेम को अभिव्यक्त करने की भाषा की खोज में जैसे - जैसे आगे बढता है तब ए परस्पर विरोधी भाव और भंगिमाएं उजागर होने लगती है |   

हजारों  ख्वाहिशें  एसी , कि हर ख्वाहिश पे दम निकले 
बहुत निकले मेरे अरमान , लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल , क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूं जो चश्मे - तर - से1 उम्र - भर यूँ  दम - ब - दम2 निकले

निकलना खुल्द3 से आदम सुनते आये थे लेकिन
बहुत बेआबरू होकर तेरे कुचे से हम निकले

मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर4 पे दम निकले

कहाँ मखाने का दरवाजा ' ग़ालिब ' और कहाँ व़ाईज़5
पर इतना जानते हैं , कल वो जाता था की हम निकले
                    ______________________


चश्मे - तर - से     :::::::::     भीगी आँख से

दम - ब - दम       ::::::::::::   क्षण - क्षण

खुल्द ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::    स्वर्ग

काफ़िर ::::::::::::::::::::::::::::::::::::  नास्तिक

व़ाईज़ ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: धर्मोपदेशक

                     ____________________________________________

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मेरे तो गिरधर गोपाल

 मीरा का समय सोलवहीं शती है | राजस्थान के मेड़ता राज्य के राठोर रत्न सिंह के यहाँ उनका जन्म हुआ था | कृष्ण के प्रति उनका लगाव बचपन से ही  गया था | उनका विवाह उदयपुर के राजा भोजराज के साथ हुआ | विवाह के थोड़े समय बाद महाराणा भोजराज का निधन हो गया | मीरा ने तो निधन के पहले कृष्ण को अपना पति मान लिया था | मीरा की भक्ति  माधुर्य भाव की थी | वे प्रियतम कृष्ण के ध्यान में डूबी रहती थी | उस समय कुलवधुओं से अपेक्षा की जाती थी की वे अंत:पुर  से बाहर कदम न रखे | मीरा ने इस आदर्श की बिलकुल प्रवाह नही की | कृष्ण  के प्रति अगाध प्रेम ने उनमे अपार आत्मविश्वास भर दिया था | तमाम वर्जनाओं से बेफिक्र वे साधू संतों की संगती करती | कृष्ण की मूर्ति के समक्ष मंदिर में नाचा करती | राजकुल के लिए ये बेहद अपमान जनक था | राजपरिवार उनके विरुद्ध हो गया | मीरा को तरह - तरह से सताया गया | उन्हें मारने के लिए विष का प्याला लोक स्मृति में दर्ज़  हैं | सारी बाधाएँ मीरा की भक्ति के सामने बेअसर साबित हुई | कृष्ण  के प्रति मीरा की विह्वलता उनके पदों में व्यक्त होती है |
                     मध्य युग में स्त्री का स्वतंत्र व्यक्तित्व समाज के लिए कितना असहाए था , मीरा का जीवन इसका प्रमाण है | मीरा अपने युग की बंदिशों का डटकर मुकाबला करती है | लोकलाज की निरर्थरकता के सम्बन्ध में उन्हें कोई भ्रम नहीं है | वे खुले तोर पर घोषणा करती है _ 
                    ' लोक लाज कुलकानि जगत के दई बहाय जस पानी | 
                          अपने घर का पर्दा करि ले मैं अबला बोरानी | '
                    मीरा के समय के प्राय : सभी महत्वपूर्ण भक्त कवि किसी न किसी संप्रदाय से जुड़े हुए थे | सम्प्रदाय से जुडाव सुरक्षा का अहसास करता था | मीरा ने इस सुरक्षा को भी नहीं स्वीकारा | वे आजीवन सम्प्रदाय - निरपेक्ष बनी रहीं | मीरा के गुरु के रूप में रैदास का नाम लिया जाता है | लेकिन यह मान्यता असंदिग्ध नहीं है | मीरा की पदावली का सम्पादन कई विद्वानों ने किया है | मीरा के पदों की भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज  भाषा है | कहीं - कहीं विशुद्ध ब्रजभाषा भी दिखाई देती है |
                  संकलित पद में मीरा ने कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम की कथा कही है | कृष्ण ही उनके सर्वस्य हैं  | दूसरा कोई आश्रय नहीं | कृष्ण के लिए उन्होंने बंधू - बांधव सबको तज़ दिया है | संतों के सानिध्य में उन्हें सुख मिलता है और संसारिकता के घेरे में दु:ख | विरह जनित आंसुओं ने उनकी प्रेम बेल को सींचा है | यह प्रेम ही जीवन का सार तत्व है | लोकापवाद ( लोगो द्वरा की गई बात ) की चिंता क्यु की जाये ? मीरा की भाषा प्रभावपूर्ण है | पद रचना में शास्त्रीय नियमों की बहुत प्रवाह नहीं करती |

मेरे तो गिरधर गोपाल , दुसरो न कोई |
जाके सर मोर मुकुट , मेरो पति सोई |
तात  मात  भ्रात  बंधु , आपनो न कोई ||
छाडि  देई कुल की कानी , कहा करै कोई |
संतन ढिंग बैठी  बैठी , लोक- लाज खोई ||
चुनरी  के किये टूक , ओढ़ी लीन्हीं लोई |
मोती मुंगे उतारि , बन माला पोई ||
अंसुअन जल सींचि - सींचि  , प्रेम - बेलि बोई |
अब तो बेलि फैली गई  , आनंद फल होई ||
प्रेम की मथनियां , बड़े जतन से विलोई |
घृत - घृत सब काढी लियो , छाछ पीओ कोई ||
भगत देखि राजी भई , जगत देखि रोई |
दासी मीरा लाल गिरधर , तारो अब मोहि ||