मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

मनुष्य की स्मृति

मनुष्य की स्मृति  अदभुत , मगर भ्रामक उपकरण होती है !
हमारे अन्दर रहने वाली समृति न तो पत्थर पर उकेरी गई 
कोई पंक्ति है और न ही एसी की समय गुजरने के बाद धुल 
जाये , लेकिन अक्सर वो बदल जाती है , या कई बाहरी
आकृति के साथ मिलकर बढ जाती है ! 

6 टिप्‍पणियां:

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आपने सही लिखा है। विचारणीय चर्चा के लिए बधाई स्वीकारें !

sagebob ने कहा…

सच लिखा आपने.
thought provoking.

मनोज कुमार ने कहा…

उत्तम विचार।

mridula pradhan ने कहा…

bahot sunder vichar.

Sunil Kumar ने कहा…

कई अर्थों को समेटे हुए अच्छी लगी , बधाई

Dr Varsha Singh ने कहा…

आप की बातों से सहमत हूँ.....