बुधवार, 29 दिसंबर 2010

पैगाम


फकत मुकद्दर पर जिन्दा रहना ,
           निकम्मापन और बुझदिली है !
अमन की दुनियां मै मेहनत करके ,
            अपना हिस्सा वसूल करलो तुम !
उजड़ जायेगा चमन ये बाक़ी ,
             गर और कांटें न हटाओगे तुम !
गुलिस्तान की गरचे खेर चाहो ,
            तो चंद कांटें कबूल  करलो तुम !

7 टिप्‍पणियां:

Kunwar Kusumesh ने कहा…

गुलिस्तान की गरचे खेर चाहो ,
तो चंद कांटें कबूल करलो तुम

सही बात कही है आपने.सहमत हूँ.

my blog: http://kunwarkusumesh.blogspot.com

muskan ने कहा…

bahut sundar abhivyakti.

Minakshi Pant ने कहा…

शुक्रिया दोस्तों !

kumar zahid ने कहा…

गुलिस्तान की गरचे खेर चाहो ,
तो चंद कांटें कबूल करलो तुम !
क्या बात है !!


नववर्ष की अनेक शुभकामनाएं

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय मीनाक्षी पन्त जी
नमस्कार !
ला-जवाब" जबर्दस्त!!
"माफ़ी"--बहुत दिनों से आपकी पोस्ट न पढ पाने के लिए ...

Ravindra Ravi ने कहा…

ला-जवाब रचना!

Minakshi Pant ने कहा…

शुक्रिया दोस्तों !