रविवार, 27 मार्च 2011

सुमित्रानंदन पंत

 सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तर प्रदेश के खुबसूरत आँचल के कौसानी गाँव में 20 मई  सन 1900   में  हुआ था | इनके जन्म के 6 घंटे पश्चात् ही इनके सर से माँ  का साया सदा के लिए हट गया | और इनका पालन -पोषण उनकी दादी ने ही किया | इनका नाम गुसाई दत्त रखा गया | इनकी प्रारंभिक शिक्षा - दीक्षा अल्मोड़ा में ही हुई | 1918 में वे अपने मंझले भाई के साथ काशी आ गये वहां वे क्वींस कॉलेज में पढने लगे | वहां से मेट्रिक उतीर्ण करने के बाद वे म्योर कॉलेज इलाहबाद चले गये वहां इंटर तक अध्ययन किया | उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया | 1919 में गाँधी जी के एक भाषण से प्रभावित होकर बिना परीक्षा दिए ही अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता  आन्दोलन में सक्रीय हो गये | उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से बंगाली , अंग्रेजी तथा संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया |
            प्रकृति की गोद , पर्वतीय सुरम्य वन स्थली  में जन्मे और पले होने की वजह से उन्हें प्रकृति से बेहद प्यार था | बचपन से ही वो सुन्दर रचनाएँ  लिखा करते थे | सन 1907 से 1918 के काल के स्वयं कवि ने अपने कवि जीवन का  प्रथम चरण माना है | इस काल की कवितायेँ वीणा में संकलित हैं | सन 1922 उच्छ्वास और सन 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ | सन साहित्य और रविन्द्र साहित्य का इन पर बड़ा प्रभाव था | पंत जी का प्रारंभिक काव्य इन्ही साहित्यिकों से प्रभावित था | सुमित्रानंदन पंत जी 1938 ईसवी में कालाकांकर से प्रकाशित ' रूपाभ ' नामक पत्र के संस्थापक भी रहे | सुमित्रानंदन पंत  जी की कुछ अन्य काव्य कृतिया हैं ___ ग्रंथि , गुंजन , ग्राम्या , युगांत , स्वर्ण - किरण , स्वर्ण - धूलि , कला और बुढा चाँद , लोकायतन , निदेबरा , सत्यकाम आदि | उनके जीवनकाल में उनकी 28   पुस्तकें प्रकाशित हुई | जिनमें कवितायेँ , पद्य - नाटक और निबंध शामिल हैं | सुमित्रानंदन पंत जी आकाशवाणी केंद्र प्रयाग में हिंदी विभाग के अधिकारी भी रह चुकें हैं | पंत जी जीवन भर अविवाहित ही रहे | हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है की सरस्वती का वरद पुत्र 28 दिसम्बर 1977 की मध्य रात्रि में इस मृत्युलोक को छोड़ कर स्वर्गवासी हो गये |
साहित्यिक विशेषताएं   _______ प्राकृतिक सौंदर्य  के साथ पंत जी मानव सौंदर्य  के भी कुशल चितेरे थे | छाया - वादी दौर के उनके काव्य में रोमानी दृष्टि से मानवीय सौंदर्य  का चित्रण है , तो प्रगतिवादी दौर में ग्रामीण जीवन के मानवीय सौंदर्य   का यथार्थवादी चित्रण | कल्पनाशीलता के साथ - साथ रहस्यानुभूति और मानवतावादी दृष्टि उनके काव्य की मुख्य विशेषताएं हैं | युग परिवर्तन के साथ पंत जी की काव्य चेतना बदलती रही है | पहले दौर में वे प्रकृति सौंदर्य  से अभिभूत छायावादी कवि हैं , तो दुसरे दौर में मानव सौंदर्य  की और आकर्षित और समाजवाद आदर्शों से प्रेरित कवि | तीसरे दौर  की उनकी कविताओं में नये  कविता की कुछ प्रवृतियों के दर्शन होते हैं तो अंतिम दौर में वे अरविन्द दर्शन से प्रभावित कवि के रूप में सामने आते हैं |
काव्यगत विशेषताएं __ भावपक्ष _
               प्रकृति _ प्रेम 
" छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया |
बाले ! तेरे बाल - जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन |
भूल अभी से इस जग को | "
              इन पंक्तियों से ये समझने के लिए काफी है की पन्त जी को प्रकृति से कितना प्यार था | पंत जी को प्रकृति का सुकुमार कवि  कहा जाता है | यद्यपि पंत जी की प्रकृति चित्रण अंग्रेजी कविताओं से प्रभावित है फिर भी कल्पना की ऊँची उड़ान है , गति और कोमलता है , प्रकृति का सौंदर्य  साकार हो उठता है | प्रकृति मानव के साथ मिलकर एकरूपता प्राप्त कर लेती है और कवि  कह उठता है |
' सिखा दो न हे मधुप कुमारि , मुझे भी अपने मीठे गान | '
           प्रकृति प्रेम के पश्चात् कवी ने लौकिक प्रेम  के भावात्मक जगत में प्रवेश  किया | पंत जी ने यौवन के सौंदर्य  तथा संयोग  और वियोग की अनुभूतियों की बड़ी मार्मिक व्यंजना की है | इसके पश्चात् कवी छायावाद    और रहस्यवाद की और प्रवृत हुए और कह उठे ____
" न जाने नक्षत्रों से कौन , निमंत्रण देता मुझको मौन | "
           अध्यात्मिक रचनाओं में पंत जी विचारक और कवि  दोनों ही रूपों में आते हैं | इसके पश्चात् पंत जी जन - जीवन की सामान्य भूमि पर प्रगतिवाद की और अग्रसर हुए | मानव की दुर्दशा को देखकर कवी कह उठे __
" शव को दें हम रूप - रंग आदर मानव का 
  मानव को हम कुत्सित चित्र बनाते शव का |"
+             +             +                      +
" मानव ! एसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति |
     आत्मा का अपमान और छाया  से रति | "
गांधीवाद और मार्क्सवाद से प्रभावित हो पंत जी ने काव्य  रचना की है | सामाजिक वैषम्य के प्रति विद्रोह का एक उदाहरण देखिये _
" जाती - पांति की कड़ियाँ टूटे , द्रोह , मोह , मर्सर छुटे ,
       जीवन के वन निर्झर फूटे वैभव बने पराभव | "
कला - पक्ष 
            भाषा __ पंत जी भाषा संस्कृत प्रधान , शुद्ध परिष्कृत खड़ी  बोली है | शब्द चयन उत्कृष्ट है | फारसी तथा ब्रज भाषा के कोमल शब्दों को इन्होने ग्रहण किया है | पंत जी का प्रत्येक  शब्द नादमय है , चित्रमय है | चित्र योजना और नाद संगीत की व्यंजना करने वाली कविता का एक चित्र प्रस्तुत है |
" उड़ गया , अचानक लो भूधर !
    फड़का अपर वारिद के पर !
      रव  शेष रह गये हैं निर्झर |
      है टूट पड़ा भू पर अम्बर ! "
पंत जी कविताओं में काव्य , चित्र और संगीत एक साथ मिल जाते हैं ___
      " सरकाती पट _
      खिसकती पट _
       शर्माती झट 
वह नमित दृष्टि से देख उरोजों के युग घाट ? "
बिम्ब योजना ___ बिम्ब कवि के मानस चित्रों को कहा जाता है | कवि बिम्बों के माध्यम से स्मृति को जगाकर तीव्र और संवेदना को बढाते  हैं | ये भावों को मूर्त एवं जिवंत बनाते हैं | पंत जी के काव्य  में बिम्ब योजना विस्तृत रूप से उपलब्ध होती है |
स्पर्श बिम्ब _____ इसमें कवि के शब्द प्रयोग से छुने  का सुख मिलता है __
" फैली खेतों में दूर तलक 
  मखमल सी कोमल हरियाली | "
दृश्य बिम्ब _____ इसे पढने  से एक चित्र आँखों के सामने आ जाता है ____
" मेखलाकार पर्वत अपार
  अपने सहस्त्र दृग सुमन फाड़ 
   अवलोक रहा है बार - बार 
     निचे के जल में महकार | "
शैली , रस , छंद , अलंकार ___ इनकी शैली  ' गीतात्मक मुक्त शैली  ' है | इनकी शैली अंग्रेजी व् बंगला शैलिओं  से प्रभावित है इनकी शैली में मौलिकता है वह स्वतंत्र है |
      पंत जी के काव्य में  श्रृंगार एवं करूँ रस का प्राधान्य है | श्रृगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुन्दर चित्रण हुआ है | छंद के क्षेत्र में पंत जी ने पूर्ण स्वछंदता से काम लिया है | उनकी परिवर्तन कविता  में रोला छंद  है _      
  " लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे | "
 तो मुक्त छंद भी मिलता है | ' ग्रंथि ' ' राधिका ' छंद में सजीव हो उठी है ____
" इंदु पर उस इंदु मुख पर , साथ ही | "
     पंत जी ने अनेक नवीन छंदों की उदभावना  भी की है | लय और संगीतात्मकता इन छंदों की विशेषता है |
    अलंकारों में उपमा , रूपक  , श्लेष , उत्प्रेक्षा , अतिश्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग है | अनुप्रास की शोभा तो स्थान - स्थान पर दर्शनीय है | शब्दालंकारों में भी लय को ध्यान में रखा गया है | शब्दों में संगीत  लहरी सुनाई देती है |
" लो , छन , छन , छन , छन 
       छन , छन , छन , छन 
थिरक गुजरिया हरती मन | "
          सादृश्य मूलक अलंकारों में पन्त जी को उपमा और रूपक अलंकर प्रिय थे | उन्होंने मानवीकरण और विशेषण - विपर्यय जैसे विदेशी अलंकारों का भी भरपूर प्रयोग  किया है |

8 टिप्‍पणियां:

Kailash C Sharma ने कहा…

सुमित्रानंदन पंत जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से इतना सुन्दर परिचय कराने के लिये आभार..

मनोज कुमार ने कहा…

पंत जी के बारे में पढकर अच्छा लगा। मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं। मैं नहीं चाहता चिर सुख लिखने वाले इस कवि को सादर नमन।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

न जाने नक्षत्रों से कौन , निमंत्रण देता मुझको मौन | "
baandh diye kyun pran pranon se
tumne chir anjaan prano se

mridula pradhan ने कहा…

dhanybad, itni sundarta se pant jee ke bare men batane ke liye.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ...दिल खुश हो गया...देश विदेश के साहित्यकारों संतों सूफियों पर आपके लेख बहुत प्रभावशाली लगे...ब्लॉग जगत में ऐसा ब्लॉग मुझे दूसरा नहीं दिखाई दिया...आप बहुत बेहतरीन लिखती हैं...बधाई स्वीकारें
नीरज

अरविन्द शुक्ल ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति

दिगम्बर नासवा ने कहा…

प्रेम और श्रांगार को बहुत सुंदरता से लिखा है पंत जी ने ... बहुत बहुत शुक्रिया आपका इस लेख के लिए ...

sudhanshu ने कहा…

पंत जी पर आपका लेख पढ़ कर अत्यंत प्रसन्नता हुई । यदि संभव हो तो "उच्छवास" कविता प्रकाशित करेँ । धन्यवाद